तितली के रंगीन परों सी जीवन में सारे रंग भरे चंचलता उसकी आँखों में चपलता उसकी बातों मे थिरक थिरक क

Tuesday, October 1, 2019

तीन बंदर

गांधी जी के
तीन बन्दर
ही तो  अब
बन गया है समाज ।

बुरा मत देखो ,
बुरा मत सुनो
बुरा मत  कहो,
सिखाते आये  गांधी जी ।

आँखे बंद किया अंधा..
अब वो कहाँ देखता बुरा,
घटना का वीडियो बनाता
एक कोने मे खड़ा ।

कान बंद किये बहरा...
सच वो बुरा नहीं सुनता,
किसी की चीत्कारों का
कोई असर नहीँ पड़ता ।

मुँह बंद किये गूँगा
अन्याय सहता
 और सहते देख
बुराई के खिलाफ वो
आवाज बुलन्द नही करता ।

गांधी होते ,
देख द्रवित होते
अपने देश का हाल
सीख उनकी ,
ढाल  ली
सबने स्वयं अनुसार ।

गांधी के चश्मे से
गांधी का भारत देखो,
बुराई  को दूर कर
भारत को स्वच्छ करो ।





4 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 2 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सटीक.

    गांधी होते ,
    देख द्रवित होते
    अपने देश का हाल
    सीख उनकी ,
    ढाल ली
    सबने स्वयं अनुसार ।

    विडंबना ? व्यंग्य ?

    अच्छा लिखा आपने. विचार स्पष्ट है. अभिव्यक्ति सरल है.

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