उर द्वारे की सांकल खनकी,धड़कन ने मधु गीत लिखा।
नयनों की आँखमिचोली ने,तुमको मन का मीत लिखा।।
टेढ़ी मेढ़ी राहें मिलतीं,सपनों की पगडंडी में
कड़ी धूप में साथ खड़े तुम,धैर्य धरा कर शीत लिखा।।
मतभेदों की नैया को भी,तुमने पार लगाया है
उष्ण हुए संबंधों ने फिर,बंधन प्रेम पुनीत लिखा।।
तन के अनुबंधों में ही क्या,प्रेम सदा परिभाषित है
पूर्ण बना कर अंतर्मन को,परिणय शुभ परिणीत लिखा।।
अधरों पर मृदु हास दिए तुम,उर उपवन महकाया है
प्रेम समर्पित जीवन देकर,तुमने हर पल जीत लिखा।।
अनिता सुधीर आख्या
इस गीतिका (या ग़ज़ल) की प्रशंसा में क्या कहूँ मैं अनिता जी ? प्रशंसा के सामान्य उपमानों से परे है यह। एक श्रेष्ठ काव्य रचना कैसी होती है, इसका सर्वोपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है इसके माध्यम से आपने। इसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है।
ReplyDeleteआपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी से लेखनी को संबल मिलता है
Deleteसादर आभार आ0
वाह!! अति मनोहारी सृजन, वाकई दिल को छू जाती है यह रचना
ReplyDeleteसुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना
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