सदा क्या गलतियाँ ही दोहराएगा।
मनुज कब हादसों से सीख पाएगा।।
नियम को तोड़ना ही शान समझें जब।
सुरक्षा का उन्हें कब अर्थ आएगा।।
सरल है दोष दूजे पर लगा देना।
स्वयं के खोट मानव कब गिनाएगा।।
तनिक सी चूक में अपने बिछड़ते जब
कमी क्या प्रियजनों की भूल जाएगा।।
सजा जब भ्रष्ट को सरकार देगी तब
सुधरता तंत्र ही जीवन बचाएगा।।
सामयिक एवं सार्थक गीतिका है यह
ReplyDeleteदुर्भाग्यपूर्ण हादसे पर बेहद मार्मिक रचना।
ReplyDeleteसादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २६ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत सुंदर
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