तितली के रंगीन परों सी जीवन में सारे रंग भरे चंचलता उसकी आँखों में चपलता उसकी बातों मे थिरक थिरक क

Wednesday, March 31, 2021

दोहे

बेल/लता

हुआ पुराना गोदना,है अब टेटू बेल।
अधुना युग की ये प्रथा,है पैसे का खेल।।

अमरबेल के रूप में,इच्छाओं का वास।
जीवन भर पोषण लिया,बना मनुज को दास।।

शंकर जी को प्रिय लगे,बेल धतूरा खास।
दुग्ध धार अर्पित करें,पूरी करते आस।।

शर्बत उत्तम बेल का,ठंडी है तासीर।
औषधि है सौ मर्ज की,हरे मनुज की पीर।।

वृक्ष तुल्य संबल मिला,सदा सजन के साथ।
लता बनी लिपटी रहूँ,ले हाथों में हाथ।।

अनिता सुधीर आख्या

22 comments:

  1. हुआ पुराना गोदना,है अब टेटू बेल।
    अधुना युग की ये प्रथा,है पैसे का खेल।।
    बिलकुल सही बात ...
    सभी दोहे एक से बढ़ कर एक ...

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 31 मार्च 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी रचना को स्थान देने के।लिये हार्दिक आभार

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  3. उव्वाहहहह
    शानदार दोहे
    सादर..

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  4. Replies
    1. जी हार्दिक धन्यवाद

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2085...किसी की याद से कितना जुड़ी हैं दीवारें ) पर गुरुवार 01 अप्रैल 2021 को साझा की गई है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी हार्दिक आभार मेरी रचना को स्थान देने के लिये हार्दिक आभार

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  6. समय की नब्ज पकड़कर लिखी
    प्रभावी रचना
    वाह

    आग्रह है मेरे ब्लॉग को भी फॉलो करें

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    1. जी अवश्य
      हार्दिक आभार

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  7. बहुत सुंदर दोहे

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  8. वाह ! बहुत ही बढ़िया ।

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  9. बहुत सुन्दर और सार्थक दोहे।
    अन्तर्राष्ट्रीय मूर्ख दिवस की बधाई हो।

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  10. मुग्धता बिखेरती सुन्दर सृजन।

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  11. बहुत ही सुंदर सभी दोहे ... समय के साथ चलते हुए

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  12. सुंदर संदेशों से सजे प्रेरक दोहे । हार्दिक शुभकामनाएं अनीता जी ।

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