शिव विवाह
त्रिनेत्र सुशोभित चंद्र ललाट, त्रिशूल लिए कर साज चलें हैं।
विचित्र लगे शिव कंठ भुजंग,बरात पिशाच समाज चले हैं।।
विभूति लगे तन मुंड कपाल,मृदंग लिए सब बाज चले हैं।
विराज रहे तब देव सुजान, विमान सजा अधिराज चलें हैं।।
संसद में प्रतिदिन की खटपट। ऊँट बदलता प्रतिक्षण करवट।। माननीय की देख रहे हठ। विषय निरर्थक से भरते घट।। संविधान को लिए हाथ में मर्यादा का तोड़...
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