Saturday, May 30, 2026

पत्रकारिता दिवस


तीस मई शुभ दिन रहा,लिखा गया इतिहास।
समाचार मार्तण्ड ने,जन में भरा हुलास।।

पत्रकार निष्पक्ष रह,लड़े बिना तलवार।
जन-जन की आवाज बन,लेता क्रांति मशाल।।

साहस संयम ही रहा,पत्रकार का मान।
सोच विषय संवाद से,लिखे नई पहचान।।

शुचिता का आधार ले,करे कर्म आरंभ।।
पत्रकार की लेखनी,लोकतंत्र का खंभ।

परिवर्तन के दौर में,माध्यम हुए अनेक।
समाचार की सत्यता,होती अब व्यतिरेक।।

प्रौढ़ कलम दम तोड़ती,बिकी कलम क्यों आज।
भटक गयी उद्देश्य से,रोता रहा समाज।।

नया कलेवर डाल के,भूली सहज प्रवाह।
पूंजीपति के कैद में,ढूँढे कलम गवाह।।

सहे कलम क्यों पीर नित,क्यों बैठे चुपचाप।
खड़ग बने जो लेखनी,हरे जगत संताप।।

अनिता सुधीर आख्या 


Saturday, May 23, 2026

कुंडलिनी

कुंडलिनी 
शरीर के सात चक्र 

कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति।
मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।।

मूलाधार चक्र

चार पंखुड़ी का कमल,रंग चक्र का लाल।
साधे मूलाधार जो,ऊँचा होता भाल।।

स्वाधिष्ठान चक्र

श्रोणि क्षेत्र के चक्र को,कहते स्वाधिष्ठान।
रंग संतरी सूर्य का,करता ऊर्जावान।।

मणिपुर चक्र

नाभि क्षेत्र के चक्र में,पीत रंग उल्लास।
पाएँ मणिपुर ध्यान से,बुद्धि ज्ञान विश्वास।।

अनाहत चक्र

चक्र हृदय के मध्य में,हरित अनाहत ध्यान।
प्रेम भाव संचार से,हुआ सतो गुण गान।।

विशुद्धि चक्र

कंठ ग्रंथि के चक्र से,होती गरल विशुद्धि।
मनोभाव को शुद्ध कर,मिली संतुलित बुद्धि।।

आज्ञा चक्र

नयन तीसरा ज्ञान का,प्रभु का आज्ञा द्वार।
देखें अंतर्ज्योति से,अंतस का संसार।।

सहस्त्रार चक्र

गुरु का सहस्त्रार में,साधक करता ध्यान।
तन मन का एकीकरण,मिला मौन का ज्ञान।।

अनिता सुधीर आख्या 

Friday, May 15, 2026

बँटवारा


नवगीत

*बँटवारा*

तुलसी चौरा व्यथित देखता
श्लोक मंत्र के पहर गए

बूढ़ा बरगद बैठा द्वारे
टुकुर-टुकुर देखे अँगना
पात-पात जब शाख बाँटते
फिर रोता माँ का कँगना
बाँट खेत खलिहान मड़ैया
बड़के भैया शहर गए।।

पेट भरे  छुटका तानों से
नित्य लुगाई  कान भरे
बड़के माँ का लाभ उठाएँ
बूढ़ा खाँसी यहाँ करे
विष दंश सहे जब बँटवारा
सर्पों के फिर जहर गए।।

नींव सोचती मीठी यादें
प्रेम पला जब किस्से में
पूछ रहीं चुप रह दीवारें 
छाया किसके हिस्से में
चक्रवात अंतस में उठते
भाव शून्य में ठहर गए।।

अनिता सुधीर आख्या

Friday, April 10, 2026

घर बनाते आजकल

घर बनाते आजकल



खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल।

मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।।


जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे,

वह स्वयं की मुश्किलों को ही बढ़ाते आजकल।।


दूर कर अपनी सरलता नित उलझते जा रहे,

चित्र भावी का भयानक यह दिखाते आजकल।।


नीति नियमों को हवा में जो उड़ाते जा रहे,

दोष नित सरकार के वह ही गिनाते आजकल।।


गर्जना कर जो बिना मौसम बरसते जा रहे,

रीतियों के वस्त्र को कैसे सुखाते आजकल।।


काल भी आभार कहता सत्पुरुष के हो ऋणी,

जो बने आदर्श सबके पथ बताते आजकल।।


अनिता सुधीर आख्या 


Thursday, April 9, 2026

गीतिका

आभासी जग का अपनापन।
हौले से छूता अंतर्मन।।

सुखद पलों को कैसे लिख दूँ 
जब मित्रों के होते दर्शन।।

बने लेखनी के संबल जो
शब्दों ने पाया उत्तम धन।।

नेह भरे नित  मार्ग दिखाए
धन्य हुआ तब काव्य सृजन।।

सरल सहज गुण गुरु से सीखा
अंतर्मन से उनका अभिनंदन।।

अनिता सुधीर आख्या 

Friday, February 6, 2026

नवगीत

हठी

आज हठी ने ठान लिया है
अपने को ही नोच

नीति नियम क्यों
ताखे पर रख
अनुशासन का 
कभी स्वाद चख

मनमानी जब
उड़े हवा में 
घर में रहना सोच

किसकी पिच पर
कौन खेलता
असमंजस को
न्याय झेलता

कुटिल चाल अब
दौड़े भागे
लिए पैर में मोच

खिड़की से क्यों
कूदे सपने
मन की बातों 
में हों अपने

चिथड़े-चिथड़े
सुख को पाते
नित ही हृदय खरोच

अनिता सुधीर आख्या

Friday, January 9, 2026

माघ


माघ के दोहे

हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार।
दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।।

कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग।
इन जोड़ों के दर्द में,लगी हुई अब आग।।

सड़कें कांपे ठंड में,जलते नहीं अलाव।
लुका छिपी कर धूप भी,करे बुरा बर्ताव।

घर में ही नित स्नान से,आए नानी याद।
कल्प वास को माघ ने,सदा रखा आबाद।।

शंका का कुहरा घना,हुए लुप्त सब कथ्य।
सच की निकले धूप जब,तभी दिखेंगे तथ्य।।


अनिता सुधीर आख्या 

पत्रकारिता दिवस

तीस मई शुभ दिन रहा,लिखा गया इतिहास। समाचार मार्तण्ड ने,जन में भरा हुलास।। पत्रकार निष्पक्ष रह,लड़े बिना तलवार। जन-जन की आवाज बन,ल...