Friday, April 10, 2026

घर बनाते आजकल

घर बनाते आजकल



खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल।

मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।।


जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे,

वह स्वयं की मुश्किलों को ही बढ़ाते आजकल।।


दूर कर अपनी सरलता नित उलझते जा रहे,

चित्र भावी का भयानक यह दिखाते आजकल।।


नीति नियमों को हवा में जो उड़ाते जा रहे,

दोष नित सरकार के वह ही गिनाते आजकल।।


गर्जना कर जो बिना मौसम बरसते जा रहे,

रीतियों के वस्त्र को कैसे सुखाते आजकल।।


काल भी आभार कहता सत्पुरुष के हो ऋणी,

जो बने आदर्श सबके पथ बताते आजकल।।


अनिता सुधीर आख्या 


Thursday, April 9, 2026

गीतिका

आभासी जग का अपनापन।
हौले से छूता अंतर्मन।।

सुखद पलों को कैसे लिख दूँ 
जब मित्रों के होते दर्शन।।

बने लेखनी के संबल जो
शब्दों ने पाया उत्तम धन।।

नेह भरे नित  मार्ग दिखाए
धन्य हुआ तब काव्य सृजन।।

सरल सहज गुण गुरु से सीखा
अंतर्मन से उनका अभिनंदन।।

अनिता सुधीर आख्या 

Friday, February 6, 2026

नवगीत

हठी

आज हठी ने ठान लिया है
अपने को ही नोच

नीति नियम क्यों
ताखे पर रख
अनुशासन का 
कभी स्वाद चख

मनमानी जब
उड़े हवा में 
घर में रहना सोच

किसकी पिच पर
कौन खेलता
असमंजस को
न्याय झेलता

कुटिल चाल अब
दौड़े भागे
लिए पैर में मोच

खिड़की से क्यों
कूदे सपने
मन की बातों 
में हों अपने

चिथड़े-चिथड़े
सुख को पाते
नित ही हृदय खरोच

अनिता सुधीर आख्या

Friday, January 9, 2026

माघ


माघ के दोहे

हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार।
दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।।

कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग।
इन जोड़ों के दर्द में,लगी हुई अब आग।।

सड़कें कांपे ठंड में,जलते नहीं अलाव।
लुका छिपी कर धूप भी,करे बुरा बर्ताव।

घर में ही नित स्नान से,आए नानी याद।
कल्प वास को माघ ने,सदा रखा आबाद।।

शंका का कुहरा घना,हुए लुप्त सब कथ्य।
सच की निकले धूप जब,तभी दिखेंगे तथ्य।।


अनिता सुधीर आख्या 

Wednesday, November 19, 2025

कुंडलियां दिवस की बधाई

कुंडलिया दिवस की बधाई 

ईश्वर

अंतर्यामी ईश में,निहित अखिल ब्रह्मांड।
निराकार के रूप में,अद्भुत अर्थ प्रकांड ।।
अद्भुत अर्थ प्रकांड,जगत के नीति नियन्ता।
पंचतत्व में व्याप्त,अटल है आदि अनंता ।।
सत्ता रही अदृश्य,अजन्मा जग का स्वामी।
सत्य चित्त आनंद,ब्रह्म है अंतर्यामी।।

ईश्वर

ईश्वर के इस रूप का,कैसे करूँ बखान।
निराकार साकार का,भेद नहीं आसान।।
भेद नहीं आसान,ईश हैं घट घट व्यापी।
कण कण में यदि वास,मूर्ति फिर रहे प्रतापी।।
मैं मूरख अंजान, सूक्ष्म कण काया नश्वर।
'शंकर' 'शिव' का भेद,बता दो मेरे ईश्वर।।

अनिता सुधीर आख्या

Saturday, November 1, 2025

प्रबोधिनी एकादशी

प्रबोधिनी एकादशी

*प्रबोधिनी एकादशी,आए कार्तिक मास।*
*कार्य मांगलिक हो रहे,छाए मन उल्लास।।*

शुक्ल पक्ष एकादश जानें।कार्तिक शुभ फलदायक मानें।।
चार मास की निद्रा लेकर।चेतन में लौटे दामोदर।।
श्लोक मंत्र से देव जगाएँ। प्रभु चरणों में शीश झुकाएँ।।
तुलसी परिणय अति पावन है।मंत्र दशाक्षरी  मनभावन है।।
भाव सुमन को उर में भरिये।विधि विधान से पूजन करिये।।
दीप धूप कर्पूर जलाएं।माधव को प्रिय भोग लगाएं।।
व्रत निर्जल जब सब जन रखते।दीन दुखी के प्रभु दुख हरते ।।
महिमा व्रत की है अति न्यारी।पुण्य प्रतापी सब नर नारी।।

*पाप मुक्त जीवन हुआ,हुआ शुद्ध आचार।*
*आराधन पूजन करे,खुले मोक्ष के द्वार।।*

अनिता सुधीर आख्या

Friday, October 31, 2025

सतीश शाह

अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

वो कहानी किस्से,यादें बुला के गए हैं।
जो हँसी देते थे,वो क्यों रुला के गए हैं।।

अनिता 

घर बनाते आजकल

घर बनाते आजकल खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल। मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।। जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे, वह स्वयं की म...