Saturday, June 27, 2026

पोशाक

लघुकथा

पोशाक

चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी। 
वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी । 
राजेश : क्या हुआ आरती
पत्नी को झकझोरते हुए बोला..
आरती अखबार राजेश की ओर बढ़ाते हुए.
किस पर विश्वास करें और सगे भी ?
पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे.
कहते हुए बेटी के कमरे की ओर चल दी...

अनिता सुधीर आख्या

#टिप्पणी
मेरी इस लघुकथा पर ये टिप्पणी मेरी लेखनी का संबल है,अभिभूत हूँ

आदरणीया अनिता श्रीवास्तव जी,
सादर नमस्कार!

          सृजनिका मध्यप्रदेश के बैनर तले हमेशा साहित्य के नित नए प्रतिमान स्थापित किए जाते रहे हैं। आज का पटल भी ‘पोशाक’ जैसी रचनाओं के माध्यम से उसी परंपरा का निर्वहन कर रहा है। समकालीन गंभीर प्रश्न को इंगित करती आपकी लघुकथा पाठकीय हृदय को झकझोर के रख देती है; समाज की विडंबना का कटु चित्रण है।

         पाँच माह की बच्ची के संदर्भ में ‘पोशाक’ का प्रश्न उठाकर रचनाकार ने पीड़िता पर दोषारोपण की मानसिकता पर तीखा व्यंग्य किया है। अंत में माँ का बेटी के कमरे की ओर बढ़ जाना उसके भय, ममता और असुरक्षा-बोध को बिना कुछ कहे ही व्यक्त करता है। यही इस लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।

         भाषा सरल और सहज है, किंतु संवादों में विराम-चिह्नों का सावधानी से प्रयोग रचना को अधिक प्रभावी बना सकता है। शीर्षक कथ्य के केंद्र को सटीक रूप से अभिव्यक्त करता है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करता है।यह लघुकथा समाज की उस विकृत सोच पर करारा प्रश्नचिह्न लगाती है, जो अपराधी के स्थान पर  पीड़िता के वस्त्रों को कटघरे में खड़ा करती है।

          व्यवहारिक दृष्टिकोण से लिखी इस रचना के लिए आपको ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएँ।

सादर वंदे!
अखिलेश श्रीवास्तव ‘दादूभाई’

Tuesday, June 23, 2026

बहिष्कार

बहिष्कार

लखनऊ लाक्षागृह के बाद एक निवेदन सभी नागरिकों से और विशेष तौर पर माता पिता  से ..

बहिष्कार कीजिए 
उस स्थल का , उस कोचिंग का , उस होटल का जहां आप अपने बच्चे को भेजने जा रहे है या आप किसी होटल में रुकने जा रहे हैं ।
सुरक्षा के आधारभूत मानक चेक करें ,जागरूक हों 
जांच पड़ताल कर ही बच्चे को भेजें।
सिस्टम में दीमक लगी हुई है ।कोई भी सरकार आएगी ये सब ऐसे ही चलता रहेगा जब तक लोगों को जमीर खुद नहीं जागेगा।
बहिष्कार कीजिए 
और उन मालिकों से अपील है कि आप स्वयं अपने संस्थान के सुरक्षा को चेक करें कल आपका बच्चा या कोई प्रियजन भी ऐसे ही भ्रष्टाचारी और लापरवाह तंत्र का शिकार हो सकता है।

अनिता सुधीर आख्या

Monday, June 22, 2026

लखनऊ कोचिंग हादसा


सदा क्या गलतियाँ ही दोहराएगा।
मनुज कब हादसों से सीख पाएगा।।

नियम को तोड़ना ही शान समझें जब।
सुरक्षा का उन्हें कब अर्थ आएगा।।

सरल है दोष दूजे पर लगा देना।
स्वयं के खोट मानव कब गिनाएगा।।

तनिक सी चूक में अपने बिछड़ते जब
कमी क्या प्रियजनों की भूल जाएगा।।

सजा जब भ्रष्ट को सरकार देगी तब
सुधरता तंत्र ही जीवन बचाएगा।।

अनिता सुधीर आख्या 

Monday, June 8, 2026

प्रियतम

उर द्वारे की सांकल खनकी,धड़कन ने मधु गीत लिखा।
नयनों की आँखमिचोली ने,तुमको मन का मीत लिखा।।

टेढ़ी मेढ़ी राहें मिलतीं,सपनों की पगडंडी में 
कड़ी धूप में साथ खड़े तुम,धैर्य धरा कर शीत लिखा।।

मतभेदों की नैया को भी,तुमने पार लगाया है
उष्ण हुए संबंधों ने फिर,बंधन प्रेम पुनीत लिखा।।

तन के अनुबंधों में ही क्या,प्रेम सदा परिभाषित है
पूर्ण बना कर अंतर्मन को,परिणय शुभ परिणीत लिखा।।

अधरों पर मृदु हास दिए तुम,उर उपवन महकाया है
प्रेम समर्पित जीवन देकर,तुमने हर पल जीत लिखा।।

अनिता सुधीर आख्या 

Saturday, May 30, 2026

पत्रकारिता दिवस


तीस मई शुभ दिन रहा,लिखा गया इतिहास।
समाचार मार्तण्ड ने,जन में भरा हुलास।।

पत्रकार निष्पक्ष रह,लड़े बिना तलवार।
जन-जन की आवाज बन,लेता क्रांति मशाल।।

साहस संयम ही रहा,पत्रकार का मान।
सोच विषय संवाद से,लिखे नई पहचान।।

शुचिता का आधार ले,करे कर्म आरंभ।।
पत्रकार की लेखनी,लोकतंत्र का खंभ।

परिवर्तन के दौर में,माध्यम हुए अनेक।
समाचार की सत्यता,होती अब व्यतिरेक।।

प्रौढ़ कलम दम तोड़ती,बिकी कलम क्यों आज।
भटक गयी उद्देश्य से,रोता रहा समाज।।

नया कलेवर डाल के,भूली सहज प्रवाह।
पूंजीपति के कैद में,ढूँढे कलम गवाह।।

सहे कलम क्यों पीर नित,क्यों बैठे चुपचाप।
खड़ग बने जो लेखनी,हरे जगत संताप।।

अनिता सुधीर आख्या 


Saturday, May 23, 2026

कुंडलिनी

कुंडलिनी 
शरीर के सात चक्र 

कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति।
मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।।

मूलाधार चक्र

चार पंखुड़ी का कमल,रंग चक्र का लाल।
साधे मूलाधार जो,ऊँचा होता भाल।।

स्वाधिष्ठान चक्र

श्रोणि क्षेत्र के चक्र को,कहते स्वाधिष्ठान।
रंग संतरी सूर्य का,करता ऊर्जावान।।

मणिपुर चक्र

नाभि क्षेत्र के चक्र में,पीत रंग उल्लास।
पाएँ मणिपुर ध्यान से,बुद्धि ज्ञान विश्वास।।

अनाहत चक्र

चक्र हृदय के मध्य में,हरित अनाहत ध्यान।
प्रेम भाव संचार से,हुआ सतो गुण गान।।

विशुद्धि चक्र

कंठ ग्रंथि के चक्र से,होती गरल विशुद्धि।
मनोभाव को शुद्ध कर,मिली संतुलित बुद्धि।।

आज्ञा चक्र

नयन तीसरा ज्ञान का,प्रभु का आज्ञा द्वार।
देखें अंतर्ज्योति से,अंतस का संसार।।

सहस्त्रार चक्र

गुरु का सहस्त्रार में,साधक करता ध्यान।
तन मन का एकीकरण,मिला मौन का ज्ञान।।

अनिता सुधीर आख्या 

Friday, May 15, 2026

बँटवारा


नवगीत

*बँटवारा*

तुलसी चौरा व्यथित देखता
श्लोक मंत्र के पहर गए

बूढ़ा बरगद बैठा द्वारे
टुकुर-टुकुर देखे अँगना
पात-पात जब शाख बाँटते
फिर रोता माँ का कँगना
बाँट खेत खलिहान मड़ैया
बड़के भैया शहर गए।।

पेट भरे  छुटका तानों से
नित्य लुगाई  कान भरे
बड़के माँ का लाभ उठाएँ
बूढ़ा खाँसी यहाँ करे
विष दंश सहे जब बँटवारा
सर्पों के फिर जहर गए।।

नींव सोचती मीठी यादें
प्रेम पला जब किस्से में
पूछ रहीं चुप रह दीवारें 
छाया किसके हिस्से में
चक्रवात अंतस में उठते
भाव शून्य में ठहर गए।।

अनिता सुधीर आख्या

पोशाक

लघुकथा पोशाक चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी।  वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी ।  राजेश : क्या हुआ आरती पत्नी को झकझोरत...