Friday, January 9, 2026

माघ


माघ के दोहे

हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार।
दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।।

कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग।
इन जोड़ों के दर्द में,लगी हुई अब आग।।

सड़कें कांपे ठंड में,जलते नहीं अलाव।
लुका छिपी कर धूप भी,करे बुरा बर्ताव।

घर में ही नित स्नान से,आए नानी याद।
कल्प वास को माघ ने,सदा रखा आबाद।।

शंका का कुहरा घना,हुए लुप्त सब कथ्य।
सच की निकले धूप जब,तभी दिखेंगे तथ्य।।


अनिता सुधीर आख्या 

प्रियतम

उर द्वारे की सांकल खनकी,धड़कन ने मधु गीत लिखा। नयनों की आँखमिचोली ने,तुमको मन का मीत लिखा।। टेढ़ी मेढ़ी राहें मिलतीं,सपनों की पगडंडी में  कड़...