अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं
घुड़कियाँ घर के पुरुष की
तर्क लड़ते गोष्ठियों में
क्यों सदी रो कर गुजारी
अब सभा चर्चा करे यह
क्यों पुरुष सत्ता रहेगी
मुक्ति ने हुंकार भर दी
कर्ण में सबके कहेगी
घुड़कियाँ घर के पुरुष की
क्या लड़ेगी वो प्रचारी।।
जब कदम ताने सुने हैं
पर निकलते छोकरी के
ताज मिलता मूढ़ता का
तथ्य कहते नौकरी के
राग छेड़े काग कड़वे
रो रही कोकिल बिचारी।।
पुत्र भाई पति पिता के
चार खंभो पर टँगी है
मातु ननदी सास की छत
वर्जनाओं से रँगी है
देखता ब्रह्मांड भी फिर
लांछनों का बोझ भारी।।
अनिता सुधीर आख्या