चित्रकार की तूलिका,भरे गगन में रंग।
सूर्य उदय की लालिमा,रचती नवल प्रसंग।।
नित्य स्वप्न भी जागते,सूर्योदय के संग।
कनक रश्मियाँ घट लिए,भरे स्वप्न में रंग।।
कुंडलिनी शरीर के सात चक्र कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति। मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।। मूलाधार चक्र चार पंखुड़ी का कमल,रंग...
अद्भुत! मनोहारी! अति-प्रशंसनीय सृजन.
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