Sunday, December 29, 2024

आत्ममंथन मां का

माँ का आत्ममंथन


मंथन चिंतन माता करती,
होम किया जीवन जिसने

खाद लाड़ की अधिक पड़ी क्या
या आँखों पर थी पट्टी
पल निद्रा अभिशाप बनी है
सोच जलाती उर भट्टी
आज अनुभवी इन आँखों से
नींद चुराई है किसने।।

यही वेदना कबसे सहती
पग पग पर दुर्योधन है
पुत्र स्वयं का कहीं खड़ा हो
करे नीच सम्बोधन है
नहीं सुरक्षित दूजी बेटी
अब यह घाव लगे रिसने।।

तेरे कृत्यों पर शर्मिंदा
साथ न अब तेरा दूँगी
धूल झोंकते जो आँखों में
खुले नैन निद्रा लूँगी
दो पाटों की धुरी सँभाले
क्यों दूँ मैं खुद को पिसने।।


अनिता सुधीर आख्या 

Friday, December 27, 2024

कहमुकरी

कहमुकरी 

1)

गरम गरम सी बातें कहता
पूरे दिन भर लिपटा रहता 
लगा दिया यों तन पर ताला
का सखि साजन ! नहीं दुशाला।।

2)
दया धर्म की बाते करता
सुखमय फिर दिन रातें करता
सदा बना वह मेरा संबल
का सखि साजन ! ना सखि कंबल।।

3)

द्वारे पर दिन गिन गिन कटते 
करूं प्रतीक्षा रटते रटते 
कब आए वह देने हर्ष 
का सखि साजन ! नहीं नव वर्ष।।

4)

जीवन की जब धूप सताए
हर दुख में वह साथ निभाए
साथ रहेंगे कसमें खाता
का सखि साजन! ना सखि छाता।।


अनिता सुधीर आख्या 
























Thursday, December 19, 2024

संसद

मैं संसद हूँ...

"सत्यमेव जयते" धारण कर,लोकतंत्र की पूजाघर मैं..
संविधान की रक्षा करती,उन्नत भारत की दिनकर मैं..
ईंटो की मात्र इमारत कब हूँ,प्राण देश के मुझमें बसते 
मान लिए निर्माताओं का,दिव्य देश का अभ्यांतर मैं।।

तार-तार जब गरिमा होती,बहा रुधिर फिर कातरता से
ज़ार ज़ार कर शुचिता रोती,राजनीति की जर्जरता से..
नेताओं का शोर शराबा,सत्य कहाँ पहचाना जाता
नित्य विवश हो आहत होती,अपनों की ही अक्षमता से।

धूमिल होती नित्य प्रतिष्ठा,दिन कैसे यह देख रही मैं
आज़ादी का अर्थ नया यह,कैसे कैसे वार सही मैं
प्रजातंत्र की लाज बचा लो,राजनीति का मान बचा लो
लौटा दो स्वर्णिम पल फिर से,वैभव का इतिहास कही मैं।।


अनिता सुधीर आख्या 



Thursday, December 5, 2024

पीर का आतिथ्य





पीर के आतिथ्य में अब
भाव सिसके भीत के

दीमकें मसि पी रहीं जब
खोखले से भाव हैं
खिलखिलातीं व्यंजनाएँ
द्वंद्व के टकराव हैं
भाष्य भी फिर काँपता
वस्त्र पहने शीत के।।

थक चुकी मसि लेखनी की
ढूँढ़ती औचित्य को
पूछती वह आज सबसे
क्यों लिखूँ साहित्य को
रूठ बैठी लेखनी फिर 
भाव खोकर गीत के।।

दाव सहती भित्तियों में
छंद अब कैसे खड़े
शब्द जो मृदुहास करते
कुलबुला कर रो पड़े
लेखनी की नींद उड़ती
आस में नवनीत के।।


अनिता सुधीर आख्या

महिला दिवस

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं घुड़कियाँ घर के पुरुष की तर्क लड़ते गोष्ठियों में क्यों सदी रो कर गुजारी अब सभा चर्चा करे यह क्यों पुरु...