प्रीति का नव गीत रच दें आज गाने के लिए।
अब दिवस अठखेलियाँ कर हों सजाने के लिए।।
दौड़ कर ही वक़्त गुजरा,चाह अब विश्राम की
साथ जी लें अब पलों को चैन पाने के लिए।।
अनिता सुधीर आख्या
रेख विभाजन के लफड़े। झेल रहा आँगन झगड़े।। रहा पृष्ठ पर बँटवारा। होते सपनों के चिथड़े।। आजादी ने कीमत दी लज्जा के उतरे कपड़े।। सुख-दुख के सब स...
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