प्रीति का नव गीत रच दें आज गाने के लिए।
अब दिवस अठखेलियाँ कर हों सजाने के लिए।।
दौड़ कर ही वक़्त गुजरा,चाह अब विश्राम की
साथ जी लें अब पलों को चैन पाने के लिए।।
अनिता सुधीर आख्या
हठी आज हठी ने ठान लिया है अपने को ही नोच नीति नियम क्यों ताखे पर रख अनुशासन का कभी स्वाद चख मनमानी जब उड़े हवा में घर में रहना सोच किसकी प...
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