Friday, May 15, 2026

बँटवारा


नवगीत

*बँटवारा*

तुलसी चौरा व्यथित देखता
श्लोक मंत्र के पहर गए

बूढ़ा बरगद बैठा द्वारे
टुकुर-टुकुर देखे अँगना
पात-पात जब शाख बाँटते
फिर रोता माँ का कँगना
बाँट खेत खलिहान मड़ैया
बड़के भैया शहर गए।।

पेट भरे  छुटका तानों से
नित्य लुगाई  कान भरे
बड़के माँ का लाभ उठाएँ
बूढ़ा खाँसी यहाँ करे
विष दंश सहे जब बँटवारा
सर्पों के फिर जहर गए।।

नींव सोचती मीठी यादें
प्रेम पला जब किस्से में
पूछ रहीं चुप रह दीवारें 
छाया किसके हिस्से में
चक्रवात अंतस में उठते
भाव शून्य में ठहर गए।।

अनिता सुधीर आख्या

6 comments:

  1. आपका यह नवगीत असाधारण है अनिता जी। केवल एक शब्द में इसका मूल्यांकन हो सकता है - उत्कृष्ट।

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    1. हार्दिक आभार आ0 आपका, आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी से लेखनी को संबल मिलता है

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  2. वाह! बहुत अच्छी कविता। सराहना से परे।

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  3. बेहद खूबसूरत रचना

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  4. बेहतरीन सृजन!!

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    1. आत्मीय आभार अनिता जी

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