Friday, October 8, 2021

माँ ब्रह्मचारिणी

मॉं ब्रह्मचारिणी के चरणों में पुष्प


कठिन तपस्या जब करी,बिल्व पत्र फल पान से।
मनोकामना पूर्ण फिर,चंद्रमौलि के  ध्यान से।।

अक्ष, कमंडल हाथ में,देवि नाम की भव्यता।
प्रेम त्याग तप साधतीं,मातु रूप में दिव्यता।।

ब्रह्मचारिणी रूप में, माँ अम्बे को पूजिए।
कर्म शक्ति अनुरूप ही,कठिन तपस्या कीजिए।।

ब्रह्मचर्य की साधना, धीरज सयंम जानिए।
सदाचार एकाग्रता, पूजन विधि ये मानिए।।

स्वाधिष्ठानी चक्र को,साधक मन जागृत करे।
विचलित चंचल मन सधे,शांत भाव झंकृत करे।।


Wednesday, October 6, 2021

कहमुक़री


**

1)

तुम बिन जीवन सूना लागे

तुम से ही  साँसों के धागे

गीत बनो मेरे ज्यों मधुकर

का सखि साजन?ना सखि दिनकर ।

2)

बनूँ  तुम्हारी  ही परछाईं ,

तुम बिन होती  है कठिनाई

मेरा जीवन तुमको अर्पण 

का सखि साजन?ना सखि दर्पण।।


3)

क्लांत चित्त को शांत करे जो

पल में धमके नहीं डरे वो

मिली प्रीति की फिर से थपकी

का सखि साजन! ना सखि झपकी।।


4)

बिन उसके अब रहा न जाए

जग में ज्यों अँधियारा छाए

गुण गान करूँ उसकी महिमा

का सखि साजन! ना सखि चश्मा।।


5)


वादों का नित जाल फैलाए

उसकी बातों में फँस जाए

बड़ा सयाना कब कुछ देता

का सखि साजन, ना सखि नेता।।


6)


कहाँ मना करने पर माने

नींद खड़ी रहती सिरहाने

हर पल सुनते उसकी खरखर 

का सखि साजन, ना सखि मच्छर।।


7)


उसकी माया के बंधन में

निशिदिन बीते ध्यान मनन में

उस पर जीवन है न्यौछावर

का सखि साजन, ना सखि तरुवर।।


8)


रिक्त हृदय में विश्वास भरे

जीवन में फिर से आस भरे

तन मन की वह हरता पीड़ा

का सखि साजन, ना सखि क्रीड़ा।।


9)


हाथ पकड़ नित संबल देते

उड़ने को तब अम्बर देते 

जब भी थी जीवन की झंझा

का सखि साजन, ना सखि मंझा।।


10)


स्वर्णिम पल जीवन में लाए

झोली भर के सुख दे जाए

उससे ही सजती उर वीथिका

का सखि साजन, ना सखि जीविका।



अनिता सुधीर

Saturday, October 2, 2021

पोशाक


लघुकथा
पोशाक


चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी। 
वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी 
राजेश! क्या हुआ आरती
पत्नी को झकझोरते हुए बोला..
आरती अखबार राजेश की ओर बढ़ाते हुए.
किस पर विश्वास करें ,सगे रिश्तेदार भी ? 
और 
पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे.
कहते हुए
बेटी के कमरे की ओर चल दी...


अनिता सुधीर आख्या
लखनऊ

Wednesday, August 25, 2021

तुम्हारी आँखों में



जीवन का मनुहार, तुम्हारी आँखों में।
परिभाषित है प्यार, तुम्हारी आँखों में।।

छलक-छलक कर प्रेम,भरे उर की गगरी।
बहे सदा रसधार, तुम्हारी आँखों में।।

तुम जीवन संगीत, सजाया मन उपवन
भौरों का अभिसार, तुम्हारी आँखों में।।

पूरक जब मतभेद, चली जीवन नैया
खट्टी-मीठी रार, तुम्हारी आँखों में।।

रही अकिंचन मात्र, मिला जबसे संबल
करे शून्य विस्तार, तुम्हारी आँखों में।।

किया समर्पण त्याग, जले बाती जैसे
करे भाव अँकवार, तुम्हारी आँखों में।।

जीवन की जब धूप, जलाती थी काया
पीड़ा का उपचार, तुम्हारी आँखों में।।

अनिता सुधीर आख्या

Friday, August 20, 2021

चीखें



चीखें
**
चीखें 
बच्चों की
अब सुनाई नहीं पड़ती 
खोमचे वाला 
गली से गुजरता है जब
गरीबी ने माँ को
चुप कराने का हुनर 
सिखा दिया होगा
*
खामोश शहरों की
चीखती रातें
चूड़ियों के टूटने की आवाज 
तन चीत्कार कर उठे
मुफलिसी में
बूढ़े माँ बाप की दवाईयाँ
और आत्मा की चीखें शांत
**
अनवरत 
अंदर चीखें रुदन करती हुईं
अधर मौन 
और फिर कागज चीखते हुए



अनिता सुधीर आख्या

Friday, August 13, 2021

कठपुतली

*कठपुतली*

आँख में अंजन दांत में मंजन 
नित कर नित कर नित कर
नाक में ऊँगली कान में लकड़ी 
मत कर मत कर मत कर"..
कितनी सरलता से हँस-हँसकर 
जीवन का पाठ पढ़ाती थी वो
दूसरों के हस्त संचालन से नाचती
काठ की कठपुतली थी वो...
जिज्ञासा थी बालमन में
कैसे डोर से बंधी ये नाचती होगी..
पर्दे के पीछे कमाल सूत्रधार का 
जो उंगलियों से उन्हें नचाता होगा...
जिज्ञासा अब शांत हो रही 
अब डोर है कितने अदृश्य हाथों में...
काठ के तो नहीं  
भावनाएं है
कुछ सपने 
कुछ आकांक्षाएं है..
निपुणता से संचालन करते हैं लोग 
परिवार धर्म मर्यादा रिश्तों के नाम पर
कितनी बखूबी से नचाते है लोग..
वो काठ की कठपुतली थी
दूसरों के इशारे पर नाचती थी वो 
और अब...

अनिता सुधीर आख्या

नशा मुक्त भारत

नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान में तुच्छ योगदान  नशा धूम्रपान धुँए के बनते छल्लों में  परिवारों का सपना सोया पेट काट कर शुल्क चुका...