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तृप्ति क्षुधा धन से कब हो,धनवान करोड़ डकार रहे।
लोभ बढ़ाकर पाप करें, कितना वह पैर पसार रहे।।
जीवन में अँधियार भरे, कुल का नित मान उतार रहे।
भूल गए असली धन को, कब सत्य प्रताप विचार रहे?
अनिता सुधीर आख्या
मुक्तक गुणी जनों ने लिख दिये,कितने सुंदर तथ्य। कड़ा परिश्रम जानिये,लिखा हुआ जो कथ्य।। आहुति देते ज्ञान की,बनती एक किताब आत्मसात कर तथ्य का,...
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