मुक्तक
माँ जन्मी अपने तन जब,वह भाव अघाती है।
सृजन पीर माधुर्य लिए,नित प्रीति लगाती है।।
करे गर्भ जब अठखेली,धड़कन सरगम बनती,
कोख सींच आशाओं से,मन द्वार सजाती है।।
अनिता सुधीर आख्या
कुंडलिनी शरीर के सात चक्र कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति। मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।। मूलाधार चक्र चार पंखुड़ी का कमल,रंग...
सुन्दर
ReplyDeleteहार्दिक आभार
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