लघुकथा
पोशाक
चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी।
वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी ।
राजेश : क्या हुआ आरती
पत्नी को झकझोरते हुए बोला..
आरती अखबार राजेश की ओर बढ़ाते हुए.
किस पर विश्वास करें और सगे भी ?
पाँच माह की बच्ची क्या पोशाक पहने ,ये समाज निर्धारित कर दे.
कहते हुए बेटी के कमरे की ओर चल दी...
अनिता सुधीर आख्या
#टिप्पणी
मेरी इस लघुकथा पर ये टिप्पणी मेरी लेखनी का संबल है,अभिभूत हूँ
आदरणीया अनिता श्रीवास्तव जी,
सादर नमस्कार!
सृजनिका मध्यप्रदेश के बैनर तले हमेशा साहित्य के नित नए प्रतिमान स्थापित किए जाते रहे हैं। आज का पटल भी ‘पोशाक’ जैसी रचनाओं के माध्यम से उसी परंपरा का निर्वहन कर रहा है। समकालीन गंभीर प्रश्न को इंगित करती आपकी लघुकथा पाठकीय हृदय को झकझोर के रख देती है; समाज की विडंबना का कटु चित्रण है।
पाँच माह की बच्ची के संदर्भ में ‘पोशाक’ का प्रश्न उठाकर रचनाकार ने पीड़िता पर दोषारोपण की मानसिकता पर तीखा व्यंग्य किया है। अंत में माँ का बेटी के कमरे की ओर बढ़ जाना उसके भय, ममता और असुरक्षा-बोध को बिना कुछ कहे ही व्यक्त करता है। यही इस लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।
भाषा सरल और सहज है, किंतु संवादों में विराम-चिह्नों का सावधानी से प्रयोग रचना को अधिक प्रभावी बना सकता है। शीर्षक कथ्य के केंद्र को सटीक रूप से अभिव्यक्त करता है और पाठक को आत्ममंथन के लिए विवश करता है।यह लघुकथा समाज की उस विकृत सोच पर करारा प्रश्नचिह्न लगाती है, जो अपराधी के स्थान पर पीड़िता के वस्त्रों को कटघरे में खड़ा करती है।
व्यवहारिक दृष्टिकोण से लिखी इस रचना के लिए आपको ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएँ।
सादर वंदे!
अखिलेश श्रीवास्तव ‘दादूभाई’
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