Saturday, November 9, 2019

एक गीत लिखते है

***
भावों के मोती चुन चुन कर,सृजन नया अब करते हैं,
नेह निमंत्रण मिला आपका,चलो एक गीत लिखते हैं

प्रभु चरणों में नमन लिखूँ,मातु पिता वंदन लिखूँ, त्याग,समर्पण प्रेम लिखूँ,या वो नया आवास लिखूँ...
दरवाजे पर टिकी निगाहें, वो वृद्धाश्रम में रहते हैं,
भीगे नयनों को स्याही बना ,चलो एक गीत लिखते हैं
नेह निमंत्रण ....

पिंजरे में कैद पंछी लिखूँ,या बेड़ियों में जकड़ी लिखूँ,
नभ की स्वच्छंद उड़ान लिखूँ, नारी का उत्थान लिखूँ...
उस वेदना को कैसे लिखूँ,जो अपने ही छला करते हैं,
मर्यादा की मसि बनाकर ,चलो एक गीत लिखते हैं ।
नेह निमंत्रण ....

चराचर जगत का शोर लिखूँ,या अंतस का मैं मौन लिखूँ,
लिप्त में निर्लिप्त भाव लिखूँ ,मोह में नया वैराग्य लिखूँ,
स्वयं से स्वयं की पहचान का,मार्ग नया चुनते हैं,
अंतःकरण की शुद्धि से ,चलो एक गीत लिखते हैं ।
नेह निमंत्रण ....

रवि किरणों का प्रातः लिखूँ,धुंध से धूमिल गगन लिखूँ,
अविरल अविरामी लिखूँ,या प्रदूषित नदिया नाला लिखूँ,
शुद्ध हवा को तरसे शब्द ,कैसा फल हम भुगतते हैं,
अपनी विनाश लीला का ,चलो एक गीत लिखते हैं।
नेह निमंत्रण ....


Thursday, November 7, 2019




चुभता प्रश्न


आध्यात्मिक गुरु के
प्रवचन का माहौल था ।
मोक्ष ,मुक्ति जैसे गूढ़ विषयों
पर  चर्चाओं का दौर था ।
जीवन में आनंद के
कुछ गुर सिखा रहे थे ।
संभ्रांत लोगो का जमावड़ा
माहौल को गंभीर बना रहा था ।
तयशुदा  लोग तयशुदा प्रश्न
पूछ रहे थे ।
उनके गूढ़ जवाब ,कुछ समझ में,
तो कुछ समझ से परे थे ।
हमने भी
....…एक सरल सा प्रश्न  उनसे पूछ लिया
अगर आपका पाठ और विधि
इतनी महान
तो इस पर इतना भारी शुल्क क्यों?
क्या इसी से देश विदेश मे
आश्रम बनवाते है !
या पाँच सितारा होटल की
सुविधा अपनी कुटिया में पाते हैं!
ये ज्ञान आम जनता तक
 मुफ्त  में   बांटिए
समाज के हर तबके तक पहुँचा
दूषित मन को शुद्ध  करिये।
...ऐसे प्रश्न की उम्मीद
शायद किसी को नहीं होगी
माहौल मे सन्नाटा छा गया
सब मुझको ताक रहे थे,
वो नजरों से वार कर रहे थे.
प्रश्न  बहुत ही सीधा था,
पर जवाब उनके लिए टेढ़ा था...
 चुभता प्रश्न था  और ।
तीर निशाने पर लगा था ।

Tuesday, November 5, 2019

*चार सौ बीस

संख्याओं का मुहावरों में क्या खूब प्रयोग है ,
कहीं चार सौ बीसी ,कहीं नौ दो ग्यारह योग है।
चार सौ बीसी का चलता क्या फर्जीवाड़ा है ,
अधिकार छीन दूसरों का,करें अपना वारा न्यारा है।
कहां से शुरू कर , चारसौ बीसी गिनाए
जिधर नजर  दौड़ाई सब  लिप्त नजर आए।
शिक्षा के लिए पोशाक,पुस्तकें सरकार भिजवाए ,
छात्रवृत्ति ,मिड डे मील की सुविधा का लाभ दिलाएं
 फर्जी वाड़ा का खेल  बड़ा निराला होता है
खाली पाठशाला,छात्र का पंजीकरण वहाँ होता है ।
राशन की दुकानों में चलता फर्जीवाड़ा है
फर्जी संस्थाओं के नाम पर करोड़ों का हवाला है।
चालक लाइसेंस बनाने में दलालों का हाथ है
चार सौ बीसी से कचहरी में सबूतों से छेड़छाड़ है ।
कहीं चार सौ बीसी  से सरकारें बनती गिरती हैं
कहीं नेताओं के कारनामों की फेहरिस्त लंबी होती है।
 नई-नई योजनाओं के नाम पर चार सौ बीसी है
भ्रम फैलाते विज्ञापन करते  मुख अंदर बत्तीसी है ।
चार सौ बीसी का इतिहास बड़ा पुराना है
कहीं इतराना  ,कहीं गवांना तो कहीं नजराना है ।
भोली भाली शक्लों पर कुछ लिखा नहीं होता,
जितना बड़ा नाम उतना ही बड़ा खेल होता है।
कोई माल्या ,नीरव बन विदेश  घूमते हैं
आशाराम ,रामरहीम जेलों  में सड़ते हैं।
कब तक  ये चार सौ बीसी चलती रहेगी
दिल दुखा दूसरों का तिजोरी भरती रहेगी ।
अन्तर्मन की आवाज कब सुन पाओगे
 सतकर्मों के अलावा साथ क्या ले जाओगे
बाज आओ चार सौ बीसी से
वक़्त की चाल बड़ी  बेरहम होती है
 नीयत सुधार कर जीवन जीना होगा खुशी से ।
©anita_sudhir
**गीत**

तुम्हें भाव अपने दिखाना न आया,
कभी प्यार के गीत गाना न आया।

तुम्हें एक पाती कभी जो लिखी थी,
मुलाकात की बात उसमें कही थी,
कि दस्तूर मुझको निभाना न आया
तुम्हीं से कहूँ क्या बताना न आया ।
कभी प्यार के गीत ...

छिपाते रहे राज हम आपसे जो,
शरारत निगाहें कि करने लगी थीं
नजर से हमें क्यों छुपाना न आया।
कभी पास अपने बुलाना न आया
कभी प्यार के गीत ...

नजर जो उठी आपकी इस तरह से ।
जमाने की' बातें सताने  लगी  थीं 
 बसायें जहां हम धवल चाँदनी में ,
सपन क्यों हमें ये सजाना न आया ।।
कभी प्यार के गीत ...

कहानी हमारी अधूरी रही  थी,
तड़प आज भी वो सताती रही है,
उलझती रही डोर मन की सदा जो ,
अहम को हमें क्यों मिटाना न आया ।
कभी प्यार के गीत ...
©anita_sudhir

Sunday, November 3, 2019

यात्रा  वृतांत
गंगोत्री से गंगासागर

अपनी यात्रा का वृतांत सुनाती हूँ
अविरल,अविराम चलती जाती हूँ,
कहीं जन्मती ,कहीं जा  समाती
मोक्षदायिनी गंगा कहलाती हूँ ।

पूर्वज भागीरथ के, भस्म शाप से
तपस्या से लाये,मुक्त कराने पाप से ,
शंकर की जटाओं से उतरी धरा पर
गंगोत्री हिमनद से चली मैदानों पर ।

भागीरथी बन गोमुख से निकली ,
कई पथगामी यात्रा में मिलते रहे,
ऊंचे नीचे पथरीले रास्तों में मिलन
मेरे सफर को सुहाना करते रहे।

धौली,अलकनंदा मिलीं विष्णुप्रयाग में
नंदाकिनी,अलकनन्दा से नंदप्रयाग में
चलते जा मिली पिंडर से कर्णप्रयाग में
मन्दाकिनी देख रही रास्ता रुद्रप्रयाग में।

 ऋषिकेश के पहले देवप्रयाग में
अलकनंदा भागीरथी का संगम हुआ ,
पवित्र पावनी बनी पंचप्रयाग में
ये मनोरम दृश्य बड़ा विहंगम हुआ ।

गढ़मुक्तेश्वर ,कानपुर हो पहुंची प्रयाग
यमुना सरस्वती से मिल जगे मेरे भाग ।
वक्र रूप लिये जा पहुंची काशी
मिर्जापुर पटना से हुई पाकुर वासी।

सोन ,गंडक ,घाघरा कोसी सहगामिनी रहीं
भागलपुर से दक्षिणीमुख पथगामिनी रही ,
मुर्शिदाबाद में बंटे,भागीरथी और पद्मा
देश बांगला अविरल बह चली   पद्मा ।

हुगली तक मैं भागीरथी रही
मुहाने तक हुगली नदी कहलाई।
सुंदरबन डेल्टा,बंगाल की खाड़ी में समाई
कपिल मुनि के दर्शन करती
हिंदुओ का पवित्र तीर्थ गंगासागर कहलाई।

पूरा हुआ यात्रा वृत्तांत,एक बात समझ न आई,
अपने पाप धोते रहे,मुझे मैला करते रहे ,
करोड़ों रुपयों खर्च कर भी ,सफाई अभी न हो पाई
जीवनदायिनी गंगा माँ हूँ ,सबका जीवन हरषाई ।
©anita_sudhir



आज के ज्वलंत विषय और समस्या पर ..

 दोहा छन्द  गीतिका
विषय    प्रदूषण
****
बीत गया इस वर्ष का,दीपों का त्यौहार।
वायु प्रदूषण बढ़ रहा ,जन मानस बीमार ।।

दोष पराली पर लगे ,कारण सँग कुछ और।
जड़ तक पहुँचे ही नहीं ,कैसे हो उपचार ।।

बिन मानक क्यों चल रहे ,ढाबे अरु उद्योग ।
सँख्या वाहन की बढ़ी ,इस पर करो विचार।।

कचरे के पहाड़ खड़े ,सुलगे उसमें आग ।
कागज पर बनते नियम ,सरकारें लाचार ।।

विद्यालय बँद हो गये  ,लगा आपातकाल ।
दूषित वातावरण में ,      देश के कर्णधार ।।

व्यथा यही प्रतिवर्ष की ,मनुज हुआ बेहाल।
सुधरे जब पर्यावरण ,तब सुखमय संसार ।।

Saturday, November 2, 2019

हमारे त्यौहार और रीति रिवाज में एक सार्थक संदेश है ।आवश्यकता है इसके मूल भाव को समझने की ,ना कि अंधविश्वास में पड़ने की।
छठ का यही सार है


जीवनदायिनी नदी को पूजने का संदेश
धर्म ही नहीं ,जड़ों से जुड़ने का संदेश
उगते और डूबते सूरज को अर्घ्य दे
सांस्कृतिक विरासत,समानता का संदेश
देते है ,रीति रिवाज और त्यौहार विशेष

नशा मुक्त भारत

नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान में तुच्छ योगदान  नशा धूम्रपान धुँए के बनते छल्लों में  परिवारों का सपना सोया पेट काट कर शुल्क चुका...