हार जीत
कुंडलियां
जीते भी हैं हार सम,लगे हार भी जीत।
लोकतंत्र अब देखता,कौन रहेगा मीत।।
कौन रहेगा मीत,सगा भी अवसर देखे।
राजनीति के रंग,बदलते कैसे लेखे।।
हुआ अचंभित देश,क्षोभ को सारे पीते।
नहीं कार्य का मोल,जाति में बॅंट कर जीते।।
अनिता सुधीर आख्या
लघुकथा पोशाक चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी। वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी । राजेश : क्या हुआ आरती पत्नी को झकझोरत...
सटीक !
ReplyDeleteसादर आभार आ0
Deleteआइए चलें अपना कर्तव्य निभाएं 😊
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