Saturday, January 11, 2020
Friday, January 10, 2020
कुंडलिया
विनती
बालक हम नादान प्रभु, समझ न पायें मूल।
हाथ जोड़ विनती करें ,क्षमा करें सब भूल।
क्षमा करें सब भूल,घिरा कष्टों से जीवन ।
राह बिछे थे शूल,दिशा से भटका था मन ।
विनती करुँ दिन रात,तुम्हीं हो जग के पालक।
देना तुम आशीष ,तुम्हारे हैं हम बालक।
बालक हम नादान प्रभु, समझ न पायें मूल।
हाथ जोड़ विनती करें ,क्षमा करें सब भूल।
क्षमा करें सब भूल,घिरा कष्टों से जीवन ।
राह बिछे थे शूल,दिशा से भटका था मन ।
विनती करुँ दिन रात,तुम्हीं हो जग के पालक।
देना तुम आशीष ,तुम्हारे हैं हम बालक।
भावुक
सरिता भावों की बहे ,बहे नैन से नीर।
भावुक मन की वेदना,समझे दूजो पीर।
समझे दूजो पीर,व्यथा वो रो कर सहते ।
सहते थे दिन रात,दुखों को उनके हरते।
कहती 'अनु 'ये बात,बना लो जीवन मुदिता ।
भावुक मन की आस ,बहे अब सुख की सरिता।
भावुक मन की वेदना,समझे दूजो पीर।
समझे दूजो पीर,व्यथा वो रो कर सहते ।
सहते थे दिन रात,दुखों को उनके हरते।
कहती 'अनु 'ये बात,बना लो जीवन मुदिता ।
भावुक मन की आस ,बहे अब सुख की सरिता।
धरती
माटी अपने खेत की,पूजें धरतीपुत्र ।
भारत का अभिमान ये,करते कर्म पवित्र ।
करते कर्म पवित्र ,कड़ा परिश्रम ये करते।
जाड़ा हो या धूप ,सदा खेतों में रहते।
सहें कठिन हालात,यही इनकी परिपाटी।
धरती का सम्मान , बुलाती अपनी माटी ।
**
मानव
मानव गुण की श्रेष्ठता,सदा रहे समभाव।
सुख दुख का कारण यही,आशाओं की नाव। आशाओं की नाव ,नहीं बस में इच्छाएं ।
करता रहा जुगाड़, समस्या मुख फैलाए।
बढ़ जाता जब लोभ ,तभी बनता वो दानव।
छोड़ लोभ अरु क्रोध ,बनो उत्तम गुण मानव ।
गागर
***
गागर में सागर भरे ,विद्वजनों के भाव,
भाव ,शब्द अरु लेखनी,करे दूर उर घाव।
करे दूर उर घाव ,तृषा मन की मिट पाये।
वंदन दोहाकार ,सृजन करते ही जाये ।
माँ वीणा आशीष,भरें भावों से सागर ।
श्रेष्ठ समाहित सीप ,छलकती इनकी गागर।
सरिता
सरिता सम स्त्री मानिये,अविरल रहा प्रवाह।
जीवनदात्री ये रहीं, शूल सहे इस राह ।
शूल सहे इस राह, रही चंचल अविरामी ।
देतीं खुशी अपार ,सदा बन के पथगामी ।
जन्म मिलन दो ठौर,रहा नदिया अरु वनिता ।
रखना होगा मान,रहे ये निर्मल सरिता ।
सरिता सम स्त्री मानिये,अविरल रहा प्रवाह।
जीवनदात्री ये रहीं, शूल सहे इस राह ।
शूल सहे इस राह, रही चंचल अविरामी ।
देतीं खुशी अपार ,सदा बन के पथगामी ।
जन्म मिलन दो ठौर,रहा नदिया अरु वनिता ।
रखना होगा मान,रहे ये निर्मल सरिता ।
Tuesday, January 7, 2020
जिजीविषा
क्यो पिघल रहा विश्वास
क्यो धूमिल हो रही आस
कैसा फैला ये तमस
चहुँ और है त्रास ही त्रास ।
कोने में सिसक रही कातरता से
मानवता जकड़ी गयी दानवता से
राह दुर्गम ,कंटको से है रुकावट
जन जन शिथिल हो गया थकावट से।
संघर्ष कर तू आत्मबल से
जिजीविषा को रख प्रबल
भोर की तू आस रख
सत्य मार्ग पर हो अटल ।
आंधियों मे भी जलता रहे
दीप आस की जलाए जा
मन का तमस दूर कर
उजियारा तू फैलाए जा ।
गीत
सरसी छन्द
एक डाल के सब पंछी हैं ,सबमें है कुछ खास।
किसी कमी पर कभी किसी का,मत करना उपहास।
सिक्के के दो पहलू होते , जैसा करें विचार,
पतझड़ बाद बहारें आतीं,ये जीवन का सार।
सुख दुख तो आना जाना है,मन क्यों करे उदास,
चार दिनों का जीवन बाकी ,करो हास परिहास।।
किसी कमी ...
सरल नहीं है मंजिल पाना ,ऐसा रखिये ध्यान,
निष्ठा और समर्पण करते ,मंजिल को आसान।
आत्मविश्वास की ताकत से,करें नित्य अभ्यास,
जो डरे नहीं बाधाओं से ,वही रचे इतिहास ।।
किसी कमी पर ...
साथ भला क्या ले जायेगा,निज कर्मों को छोड़,
अब अच्छे कर्मों से अपने,खाते में कुछ जोड़ ।
परोपकार में तन लगा दें,भूखे को दे ग्रास।
सतकर्मों से मिट पायेगा,धरती माँ का त्रास।।
किसी कमी ...
जो होना वो होकर रहता ,कहता कर्म विधान,
डर डर के जीवन क्या जीना ,रखिये स्व अभिमान।
आशाओं का दीप जला के,मन में करें उजास,
भाग्य का लेखा कहाँ टला , राम गये बनवास।।
किसी कमी...
एक डाल के सब पंछी हैं ,सबमें है कुछ खास।
किसी कमी पर कभी किसी का,मत करना उपहास।
©anita_sudhir
सरसी छन्द
एक डाल के सब पंछी हैं ,सबमें है कुछ खास।
किसी कमी पर कभी किसी का,मत करना उपहास।
सिक्के के दो पहलू होते , जैसा करें विचार,
पतझड़ बाद बहारें आतीं,ये जीवन का सार।
सुख दुख तो आना जाना है,मन क्यों करे उदास,
चार दिनों का जीवन बाकी ,करो हास परिहास।।
किसी कमी ...
सरल नहीं है मंजिल पाना ,ऐसा रखिये ध्यान,
निष्ठा और समर्पण करते ,मंजिल को आसान।
आत्मविश्वास की ताकत से,करें नित्य अभ्यास,
जो डरे नहीं बाधाओं से ,वही रचे इतिहास ।।
किसी कमी पर ...
साथ भला क्या ले जायेगा,निज कर्मों को छोड़,
अब अच्छे कर्मों से अपने,खाते में कुछ जोड़ ।
परोपकार में तन लगा दें,भूखे को दे ग्रास।
सतकर्मों से मिट पायेगा,धरती माँ का त्रास।।
किसी कमी ...
जो होना वो होकर रहता ,कहता कर्म विधान,
डर डर के जीवन क्या जीना ,रखिये स्व अभिमान।
आशाओं का दीप जला के,मन में करें उजास,
भाग्य का लेखा कहाँ टला , राम गये बनवास।।
किसी कमी...
एक डाल के सब पंछी हैं ,सबमें है कुछ खास।
किसी कमी पर कभी किसी का,मत करना उपहास।
©anita_sudhir
Sunday, January 5, 2020
दोहा छन्द गीतिका
नैतिक शिक्षा
कच्ची मिट्टी के घड़े,सोच समझ कर ढाल,
उत्तम बचपन जो गढ़े,नैतिक होगा काल।
रहे गणित विज्ञान सँग,नैतिक शिक्षा पाठ,
मूल तत्व को जानिये,चलिये उत्तम चाल ।
उन्नत जीवन का रहे , नैतिकता आधार ,
नैतिक मूल्यों से मिटे ,गद्दारी का जाल ।।
नैतिकता मन में रखें ,करें नारि सम्मान ,
विकृत मानसिक जन रहें ,ज्यों लग्घड़ की खाल ।
महापुरुष की जीवनी ,मन में भरती जोश,
नैतिकता की सीख दें,भारत माँ के लाल ।
कीमत इसकी जानिये ,नैतिकता अनमोल,
अंक विषय का जोड़िये ,करें इसे तत्काल।
देशप्रेम ज्वाला जले ,श्रेष्ठ नागरिक भाव ,
हवन कुंड की अग्नि बन ,जीवन समिधा डाल ।
अनिता सुधीर
नैतिक शिक्षा
कच्ची मिट्टी के घड़े,सोच समझ कर ढाल,
उत्तम बचपन जो गढ़े,नैतिक होगा काल।
रहे गणित विज्ञान सँग,नैतिक शिक्षा पाठ,
मूल तत्व को जानिये,चलिये उत्तम चाल ।
उन्नत जीवन का रहे , नैतिकता आधार ,
नैतिक मूल्यों से मिटे ,गद्दारी का जाल ।।
नैतिकता मन में रखें ,करें नारि सम्मान ,
विकृत मानसिक जन रहें ,ज्यों लग्घड़ की खाल ।
महापुरुष की जीवनी ,मन में भरती जोश,
नैतिकता की सीख दें,भारत माँ के लाल ।
कीमत इसकी जानिये ,नैतिकता अनमोल,
अंक विषय का जोड़िये ,करें इसे तत्काल।
देशप्रेम ज्वाला जले ,श्रेष्ठ नागरिक भाव ,
हवन कुंड की अग्नि बन ,जीवन समिधा डाल ।
अनिता सुधीर
Saturday, January 4, 2020
हंसमाला छंद
सगण,रगण,गुरु
११२,२१२,२
वह बातें पुरानी
ऋतु थी वो सुहानी।
ढलती यामिनी में
खिलती चाँदनी में ।
खनकी चूड़ियाँ थीं
बजती झांझरे थीं।
महकी टेसुओं सी
चहकी कोयलों सी।
फिर दोनों मिले थे
सपने क्या सजे थे ।
नभ में वो उड़े थे
धरती से जुड़े थे ।
सच वो जानते थे
घर की मानते थे ।
जकड़ी बेड़ियां थीं
पिछड़ी रीतियाँ थी।
ठिठकी रात है क्यों
ठहरी बात है क्यों ।
अब ये दूरियां हैं
कि परेशानियाँ है ।
कहता क्या जमाना
इसका है फ़साना ।
बिसरा दो पुराना
अब गाओ तराना ।।
अनिता सुधीर
सगण,रगण,गुरु
११२,२१२,२
वह बातें पुरानी
ऋतु थी वो सुहानी।
ढलती यामिनी में
खिलती चाँदनी में ।
खनकी चूड़ियाँ थीं
बजती झांझरे थीं।
महकी टेसुओं सी
चहकी कोयलों सी।
फिर दोनों मिले थे
सपने क्या सजे थे ।
नभ में वो उड़े थे
धरती से जुड़े थे ।
सच वो जानते थे
घर की मानते थे ।
जकड़ी बेड़ियां थीं
पिछड़ी रीतियाँ थी।
ठिठकी रात है क्यों
ठहरी बात है क्यों ।
अब ये दूरियां हैं
कि परेशानियाँ है ।
कहता क्या जमाना
इसका है फ़साना ।
बिसरा दो पुराना
अब गाओ तराना ।।
अनिता सुधीर
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