Saturday, January 4, 2020

हंसमाला छंद
सगण,रगण,गुरु
 ११२,२१२,२

वह बातें पुरानी
ऋतु थी वो सुहानी।
ढलती यामिनी में
खिलती चाँदनी में ।
खनकी चूड़ियाँ थीं
बजती झांझरे थीं।
महकी टेसुओं सी
चहकी कोयलों सी।

फिर दोनों मिले थे
सपने क्या सजे थे ।
नभ में वो उड़े थे
धरती से जुड़े थे ।
सच वो जानते थे
घर की मानते थे ।
जकड़ी बेड़ियां थीं
पिछड़ी रीतियाँ थी।

ठिठकी रात है क्यों
ठहरी बात है क्यों ।
अब ये दूरियां हैं
कि परेशानियाँ है ।
कहता क्या जमाना
इसका है फ़साना ।
बिसरा दो पुराना
अब गाओ तराना ।।

अनिता सुधीर





2 comments:


  1. ठिठकी रात है क्यों, ठहरी बात है क्यों ।
    अब ये दूरियां हैं, कि परेशानियाँ है ।
    वाह, यही अतिरेक व भाव मुझे भाते हैं । सुन्दर लेखन हेतु साधुवाद आदरणीया।

    ReplyDelete
  2. जी सादर अभिवादन और आभार

    ReplyDelete

आयुर्वेद दिवस

शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग।  वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...