Thursday, July 28, 2022

नशा


मुक्तक


कड़ा परिश्रम दिन भर करके,चार टके घर को लाया।

बोझ देखता जब कंधों पर,माथा उसका चकराया।।

चला शौक से मदिरालय फिर,घरवाली को धमकाया।

पल भर का आनंद मिला जो,खुशियां गिरवी रख आया।।


भीड़ बढ़ी मदिरालय में अब,काल आधुनिक आया है।

मातु पिता सँग बच्चे पीते,संस्कृति को बिसराया है।।

प्रेम रोग का बना बहाना,मन का दर्द मिटाया है।

अर्थ व्यवस्था टिकी इसी पर,शासन ने बिकवाया है ।।



अनिता सुधीर आख्या

2 comments:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 29 जुलाई 2022 को 'भीड़ बढ़ी मदिरालय में अब,काल आधुनिक आया है' (चर्चा अंक 4505) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:30 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

    ReplyDelete

नवगीत

हठी आज हठी ने ठान लिया है अपने को ही नोच नीति नियम क्यों ताखे पर रख अनुशासन का  कभी स्वाद चख मनमानी जब उड़े हवा में  घर में रहना सोच किसकी प...