Sunday, September 29, 2019

हौसले परवाज हैं   

जीवन सागर की लहरों सा
हर लहर ,कदम इक साज है,
कभी शांत,कभी उथल पुथल,
हौसले परवाज हैं....

बाधाओं को हँस कर गले लगाते,
जब तूफाँ में डूब रहा जहाज है ,
उनके ही सर पर ताज है ,
जिनके हौसले परवाज हैं ....

वर्जनाओं की बेड़ियों में जकड़ी
बेटियां देने लगीं नित आवाज हैं,
छूती आसमां ,निराले अंदाज हैं
हौसले परवाज हैं ....

बेईमानों का करना इलाज है
ये मद में डूबे हुए गजराज हैं,
ले आयें जग में सुराज हैं ,
हौसले परवाज हैं....

फांसी पर झूलता किसान और
गोदामों में सड़ता अनाज है
आओ बदलें समाज के रिवाज
 हौसले परवाज हैं....

पालन उचित रीति रिवाज का,
सुखी जीवन का यही राज है ।
जीवन में होगा ऋतुराज ,
हौसले परवाज हैं....

उद्घोष है नव समाज का
धैर्य विवेक मिजाज है,
इलाज हुआ पत्थरबाज का
और हौसले  परवाज हैं....

स्वरचित
अनिता सुधीर












Saturday, September 28, 2019





गीतिका
*****
परहित सदा करते रहे विषपान है,
अंतर सरल है नेक वो धनवान है ।

क्यों आज फैला ये तमस चहुँ ओर है,
इसको मिटाना लक्ष्य प्रथम प्रधान है

उम्मीद का दीपक  सदा जलता रहे,
अब आंधियों को ये नया  प्रतिदान है।

दुःख काल में विसरित न हो स्थिर रहे
जग में सदा रहता वही बलवान है ।

रहते सजग जो देश हित में सर्वदा,
उन का सदा होता रहा गुणगान है ।

यूँ छोड़ के जाने कहाँ  वो अब चले,
विस्मृत कठिन स्मृति समाहित प्रान हैं।


मंथन
मुक्तक

मंथन का ये विष मुझे अब पीना होगा
बिन अमरत्व की चाह अब जीना होगा,
तुम गलत कभी हो सकते हो,भला
मुझे ही अपने होठों को अब सीना होगा ।


Friday, September 27, 2019




क्षणिकाएं
पोशाक
1)
अजर अमर आत्मा
बदलती रहती
नित नई पोशाक ,
पोशाक कभी वो
शीघ्र क्यों बदलती!
2)
एक पोशाक
दुखों के छिद्र से भरी हुई
अवसाद से छिद्र बढ़ते हुए
पैबंद लगाने बैठे छिद्रों
पर सुखों का ,
विश्वास के धागों से
सपने टांके,
लगन की सुनहरी जरी से
पोशाक बड़ी खूबसूरत नजर आई ।
3)
पोशाक पर
ऊँगली उठती बार बार
बच्चियों की पोशाक
बता दे कोई ।
4)
वर्दी बड़े सम्मान का विषय
कितनों की कुर्बानी 
वर्दी की आन शान में ,
एक मेडल और सजा था
 वर्दी पर
उसके जाने के बाद ।
5)
आज दुकान पर भीड़ बड़ी
पोशाक सिलवाने आये सभी,
सोचा सबकी एक सी सिल दूँ
इतनी शक्ति देना प्रभू!
सबकी पोशाक  में
धरा की हरियाली
केसरिया शक्ति दे दूँ
श्वेत हिमकणों की शीतलता से
प्रेम का रंग लाल भर दूँ ।
©anita_sudhir
स्वेद/पसीना
**
खेतों में
धूप के समंदर में
पसीने का दरिया
बहाता किसान!
पसीना नहीं ,लहू बहता है
तब किसान आधा पेट खा कर
दूसरों का पेट भरता है ।

सड़कों पर
पसीने के आगोश में
बोझे को गले लगाता मजदूर !
अपने लहू से सींच
दूजे का महल
खुद सड़क किनारे सो जाता है।

सीमा पर
जवान धूप में
खड़ा अपना फर्ज  निभाता !
अपनों की चिंता किये बिना
हमारी रक्षा में शहीद हो जाता है ।

घर में
पिता जीवन भर
परिवार के लिये
खून  पसीना बहाता !
स्वयं कम में गुजारा कर
अपना जीवन होम कर जाता ।

पसीने की स्याही
से लिखता जो
अपने जीवन के कोरे पन्ने!
 वो खून के आँसू नहीं
खुशियों के अश्कों से
जिंदगी भिगोया करता है।



सत्य
सत्य  लिखना कटु ही होता है ,
झूठ चासनी में पगा होता है।
एक कटु सत्य सामने आ खड़ा हो जाता
सोच सोच कर जीना दुश्वार किया करता है ।
मंगल तक हम पहुँचे एक  ही प्रयास में
चाँद तक पहुंचने की आस में
ऊँचा भारत का नाम है ,
देश के वैज्ञानिकों को सलाम है।
पर कटु सत्य  पर नजर डालिए
सरकार और वैज्ञानिक इस ओर भी कदम बढ़ाइए।
सेप्टिक टैंक और गटर में
सफाई कर्मचारियों के क्यों जाते प्राण है।
आपने कभी सोचा या बनते अनजान हैं।
उपकरण ,प्रौद्योगिकी विकसित हो  रही
लाखों किलोमीटर दूर हमारा नियंत्रण है
इन के लिए सुरक्षा के क्या उपकरण है ?
सामान्य स्थितियों में
कोई गटर में उतर नहीं सकता
बिना नशा किये कोई
इसे स्वच्छ  कर नहीँ  सकता ।
जहरीली गैसों का रिसाव
और दम घुटने से मृत्यु
इनकी कोई खबर नहीं आती
इनकी मौत  टी आर पी नहीँ  बढ़ाती
वोटबैंक भी बेअसर रहता
एक दो दिन बाद लाश की तरह
मामला भी ठंडा हो जाता ।
मास्क ,जैकेट ग्लव्स  हैं
तो क्या इनका  अकाल है
या इसमें भी फैला भ्रस्टाचार है।
प्रौद्योगिकी और विकास के विरोधी नहीं
ये कटु सत्य सदैव प्रश्रचिन्ह बन खड़ा  रहता है ।
©anita_sudhir

Thursday, September 26, 2019


ईश्वर चंद्र विद्यासागर

ईश्वर चंद्र विद्यासागर  बंगाल के प्रसिद्ध दार्शनिक, शिक्षाविद, समाज सुधारक, लेखक ,अनुवादक थे ।
ऐसे महापुरुष को उनकी जयंती पर श्रद्धा पूर्ण कोटि कोटि नमन ।

जीवन परिचय:
बंगाल के पुनर्जागरण के स्तंभ में से एक ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी का जन्म  26 सितंबर सन 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के वीर सिंह गांव में एक अति निर्धन परिवार में हुआ था ।
इनके पिता का नाम ठाकुरदास बंदोपाध्याय बंदोपाध्याय  और माता का नाम भगवती देवी था ।

 शिक्षा:
तीक्ष्ण बुद्धि पुत्र को गरीब पिता ने विद्या के प्रति रुचि विरासत में प्रदान की थी।
 9 वर्ष की अवस्था में बालक ने पिता के साथ पैदल कोलकाता जाकर संस्कृत कॉलेज में विद्यारंभ में विद्यारंभ में विद्यारंभ किया। शारीरिक अस्वस्थता घोर आर्थिक कष्ट गृह कार्य के बावजूद ईश्वर चंद ने ने प्रायः प्रत्येक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया ।1841 में विद्या समाप्ति पर फोर्ट विलियम कॉलेज में में ₹50 मासिक पर मुख्य पंडित पद पर नियुक्ति मिली।
 संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध पांडित्य के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज में संस्कृत कॉलेज में उन्हें विद्यासागर की उपाधि प्रदान की थी। 1846 में  संस्कृत कॉलेज में सहकारी संपादक नियुक्त हुए किंतु मतभेद पर त्यागपत्र पर त्यागपत्र दे दिया।
1851 में यह कॉलेज के मुख्य अध्यक्ष बने परंतु त्यागपत्र दे कर इन्होंने  अपना जीवन साहित्य और समाज की सेवा में लगा दिया ।

उल्लेखनीय योगदान:
 वे नारी शिक्षा के समर्थक थे। इन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल की स्थापना की थी और अपने ही खर्चे से मेट्रोपोलिस कॉलेज की भी स्थापना की थी।संस्कृत अध्ययन की सुगम प्रणाली निर्मित की की। समाज सुधार इनका प्रिय क्षेत्र था जिससे इन्हें कट्टरपंथियों का तीव्र विरोध सहना पड़ा।
विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे। शास्त्रीय प्रमाणों में विधवा विवाह को वैध प्रमाणित किया। पुनर्विवाह विधवाओं के पुत्रों को 1865 में उन्होंने वैध घोषित घोषित करवाया यहां तक कि अपने पुत्र का विवाह  विधवा से ही किया ।
संस्कृत कॉलेज में केवल ब्राह्मणों  और वैद्य   शिक्षा प्राप्त कर सकते थे ।अपने प्रयत्नों से से इन्होंने समस्त हिंदुओं के लिए विद्या का द्वार खोला ।
साधारण व्यक्ति होते हुए भी इन्होंने यह दान पुण्य के काम में असाधारण कार्य किए जिससे लोग इन्हें दयासागर भी कहते थे।

साहित्यिक योगदान:
बंगला गद्य के क्षेत्र में इनका उल्लेखनीय योगदान है। इन्होंने 52 पुस्तकों की रचना की है। जिसमें से 17 संस्कृत में है संस्कृत में है है ।वेतालपंच विंशति ,शकुंतला और सीता बनवास इनकी प्रसिद्ध कृति है।

 जीवन के अंतिम काल:
 स्वार्थी व्यवहार से तंग आकर इन्होंने अपने परिवार के साथ संबंध विच्छेद कर लिया ,और जीवन के अंतिम वर्ष जामताड़ा जिले के कर्माताण्ड में संताल आदिवासियों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। इनके निवास का नाम नंदनकानन था।
 इनके सम्मान में ही अब इस स्टेशन का नाम विद्यासागर रेलवे स्टेशन कर दिया गया है।

मृत्यु :70 वर्ष की आयु में,29 जुलाई 1891 में इनकी मृत्यु  हुई।

आज भी इनके धरोहर  को मूल  रूप  में व्यवस्थित रखा गया है और महत्वपूर्ण सेवा कर इनके कार्यों को गतिशीलता प्रदान की जा रही है ।


नशा मुक्त भारत

नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान में तुच्छ योगदान  नशा धूम्रपान धुँए के बनते छल्लों में  परिवारों का सपना सोया पेट काट कर शुल्क चुका...