मंथन
मुक्तक
मंथन का ये विष मुझे अब पीना होगा
बिन अमरत्व की चाह अब जीना होगा,
तुम गलत कभी हो सकते हो,भला
मुझे ही अपने होठों को अब सीना होगा ।
लघुकथा पोशाक चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी। वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी । राजेश : क्या हुआ आरती पत्नी को झकझोरत...
सादर आभार आ0
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