Wednesday, February 12, 2020

नारी


नारी का अपमान कर,करते क्यों उपभोग।
विज्ञापन में छाप के ,कैसा करा प्रयोग ।
कैसा करा प्रयोग ,समझते भोग्या उसको।
हुआ पतन जो आज,कहाँ चिंता अब किसको।
सकल सृजन की सार ,वस्तु बनती बेचारी ।
रही धुरी परिवार,प्रेम की मूरत नारी ।

Tuesday, February 11, 2020

रुझान

पंक मध्य अब कमल नहिं,साफ हुआ अब हाथ
मुफ्त नीर विद्युत चला ,लेकर सबको साथ ।

Monday, February 10, 2020

मुफ्त



हारा जीता 'मुफ्त' में ,बना तमाशा खेल।
परिपाटी मतदान की,'बिरयानी' सँग मेल।
बिरयानी का मेल,'बाग'के होते चर्चे ।
नेताओं की जीत ,कराती कितने खर्चे ।
अपशब्दों का दौर ,किसी को 'डंडा"मारा।
हुआ 'मुफ्त'का लोभ ,तंत्र हरदम ही हारा।

अनिता सुधीर

Sunday, February 9, 2020

खोता बचपन

***
दादी बाबा संग नहीं
भाई बहन का चलन नहीं
नाना नानी दूर हैं
और बच्चे...
एकाकी बचपन को मजबूर हैं ।
भौतिक सुविधाओं की होड़ लगी
आगे बढ़ने  की दौड़ है
अधिकार क्षेत्र बदल रहे
कोई  कम क्यों रहे
मम्मी पापा कमाते हैं
क्रेच छोड़ने जाते हैं
शाम को थक कर आते हैं
संग समस्या लाते हैं
बच्चों  खातिर समय नहीं
मोबाइल , गेम थमाते है
बच्चों के लिये कमाते हैं
और बच्चे ...
बचपन खोते जाते हैं ।
आबोहवा अब शुद्ध नहीं
सड़कों पर भीड़ बड़ी
मैदान  खेल के लुप्त हुए
बस्ते का बोझ बढ़ता गया
कैद हो गये चारदीवारी में
न दोस्तों का संग  मिला
बच्चों का ....
बचपन खोता जाता है
बच्चा समय से पहले  ही
बड़ा होता जाता है।
याद करें
अपने बचपन के दिन
दादी के  वो लाड़ के दिन
भाई बहनों संग मस्ती के दिन
दोस्तों संग वो खेल खिलौने के दिन
क्या ऐसा बचपन अब बच्चे पाते हैं
बच्चे ....
अपना बचपन खोते जाते हैं
आओ हम बच्चों का बचपन लौटाएं
स्वयं उनके संग बच्चे बन  जायें
वो बेफिक्री के दिन लौटा दें
बच्चों का बचपन लौटा दें।
©anita_sudhir

Thursday, February 6, 2020

गगन के पार

नवगीत


कल्पना उड़ती हुई ये
पूछती हर बार,
क्या चलोगे साथ मेरे
तुम गगन के पार ।

कितने सावन बीत गये
कभी बुझी न प्यास,
मन धरा बंजर तरसता
बूँद की थी आस ,
व्यथित हृदय चातक बन के
रहा फलक निहार
क्या चलोगे साथ मेरे  ,
तुम गगन के पार ।

अश्व पर हों साथ हम जो
लगती तेरे अँग,
आओ भर लें जीवन में
इंद्रधनुष के रँग ।
छोर पकड़े धूप के हम
रथ पर हो सवार ।
क्या चलोगे साथ मेरे  ,
तुम गगन के पार ।

बनी हैं सहगामिनी जो
बारिश की बूंदे,
कल्पनाओं में विचरते
मन  दादुर कूदे
चाँद का टीका पहन लें,
हों सितारे हार
क्या चलोगे साथ मेरे  ,
तुम गगन के पार ।

अनिता सुधीर










Monday, February 3, 2020

अहिंसा

**
सत्य अहिंसा बात पुरानी,रार मचाना आता है ।
दूजे घर में आग लगा के,दाल पकाना आता है ।।

देख! द्रवित होते अब गांधी,ग़द्दारों से देश भरा ,
शिक्षा के मंदिर में देखो,हथियारों से नाता है ।।

अपशब्दों का दौर बढ़ा है ,वादों की अब झड़ी लगी,
विश्वास नहीं नेताओं पर,इंसान ठगा जाता है ।

रामराज्य का सपना देखा, हिंसा बढ़ती जाती है,
अपनी ढपली राग बजाते ,भारत कहाँ सुहाता है।।

सीमाओं पर जो डटे रहे,याद करो बलिदानों  को
इन छोटी बातों पर तुमको, गाल बजाना भाता है ।

समृद्ध संस्कृति भारत की है ,इसका मान बढ़ाएं हम ,
सत्य अहिंसा का व्रत लेकर,वचन निभाना आता है ।


©anita_sudhir

Saturday, February 1, 2020

दोहावली

मधुर रागिनी छेड़ के ,धरा करे श्रृंगार ।
ऋतु वसंत मधुमास है ,बहती मुग्ध बयार ।।

महक पुष्प की फैलती ,होता ज्यों गुणगान ।
विसरित सौरभ मनुज की ,करिये कर्म महान ।।

सात सुरों को साध के ,गायें सरगम गीत ।
त्याग और विश्वास से,निभे जगत में प्रीत ।

किंशुक लाली फैलती ,खिलता वृक्ष पलाश।
सूरज की ज्यों लालिमा,फैली अब आकाश ।।

लगे झूलने बौर अब ,कोयल झूमे डाल ।
पुष्पों से मकरंद पी,मस्त भ्रमर की चाल ।।

युग ये कैसा आ गया ,चरण वंदना धर्म।
झूठे का गुणगान ही,चारण का अब कर्म।।

अंतस के शृंगार से, जीवन का उल्लास।
फैले किंशुक लालिमा,प्रतिदिन हो मधुमास ।।

©anita_sudhir

आयुर्वेद दिवस

शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग।  वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...