नारी का अपमान कर,करते क्यों उपभोग।
विज्ञापन में छाप के ,कैसा करा प्रयोग ।
कैसा करा प्रयोग ,समझते भोग्या उसको।
हुआ पतन जो आज,कहाँ चिंता अब किसको।
सकल सृजन की सार ,वस्तु बनती बेचारी ।
रही धुरी परिवार,प्रेम की मूरत नारी ।
हठी आज हठी ने ठान लिया है अपने को ही नोच नीति नियम क्यों ताखे पर रख अनुशासन का कभी स्वाद चख मनमानी जब उड़े हवा में घर में रहना सोच किसकी प...
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