नारी का अपमान कर,करते क्यों उपभोग।
विज्ञापन में छाप के ,कैसा करा प्रयोग ।
कैसा करा प्रयोग ,समझते भोग्या उसको।
हुआ पतन जो आज,कहाँ चिंता अब किसको।
सकल सृजन की सार ,वस्तु बनती बेचारी ।
रही धुरी परिवार,प्रेम की मूरत नारी ।
शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग। वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...
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