Monday, August 3, 2020

राखी

सोरठा    
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कथा रही प्राचीन,प्रेम त्याग त्यौहार की।
काल हुआ आधीन ,इन्द्राणी तप सूत्र से,।।(१)

कर्णवती का नेह,मुगल हुमायूँ बाँधते।
बचा बहन का गेह,वचन सुरक्षा का निभा।।(२)

पावन  रेशम डोर,बाँधे बंधन नेह के ।
भीगे मन का कोर,खुशियों के त्यौहार में।।(३)

सजती राखी हाथ,तिलक सजा के शीश पर।
उन्नत तेरा माथ,बहना दे आशीष ये ।।(४)

आशाओं की डोर,कठिन पलों में थाम लो।
सुखद नवल हो भोर,भाई करना यत्न ये।।(५)

पर्व हुये व्यापार,बैठा है झूठा अहम।
भ्रात बहन का प्यार,इस जग में अनमोल है।(६)

करिये सार्थक अर्थ,रक्षा बंधन पर्व का ।
होंगें तभी समर्थ,धरती की रक्षा करें।।(७)

भैया रखना मान,सभी बहन के प्रेम का।
प्रण यह मन में ठान,नहीं कभी व्यभिचार हो।(८)

ऐसी राखी आज,सैनिक को सब बाँध दें।
रहे शीश पर ताज,हाथ न सूने हों कभी।।(९)

आया विपदा काल,शुद्ध कलावा बाँधिये।
समझें पल की चाल,अपनी रक्षा आप कर।।(१०)

Friday, July 31, 2020

नई शिक्षा नीति


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भारत शिक्षा नीति में,करे बड़ा बदलाव।
सभी वर्ग के साथ से,उत्तम मिले सुझाव ।।

निज भाषा में ज्ञान से,सम्प्रेषण आसान।
पाठ समझते थे नहीं,रटना था अभियान ।।

करे क्षेत्रीय बोलियां,संस्कृति का उत्थान।
उचित दिशा निर्देश से,करें नीति का मान।।

कक्षा छह प्रारंभ से,अधुना शिक्षण ज्ञान।
रोजगार अभियान है,लक्ष्य यही अब जान।।

मानविकी विज्ञान को,पढ़ें साथ ही साथ।
लाभप्रद है योजना,मिटे सभी के क्वाथ।।

शिक्षा छूटे मध्य यदि,नहीं अभी नुकसान।
पूर्ण करें अब बाद में,ले इसका संज्ञान ।।

कार्य चुनौती पूर्ण है,और नियम भी खास।
नींव बने मजबूत अब,लगी यही है आस।।

अनिता सुधीर आख्या





Wednesday, July 29, 2020

मोह


#मोह
#दोहा गीत
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प्रेम मोह में भेद कर,हे मानव विद्वान।
रेख बड़ी बारीक है,मूल तत्व को जान।।

त्याग समर्पण प्रेम है,प्रेम रहे निस्वार्थ।
प्रेम लीनता मोह है,समझें यही यथार्थ।।
पुत्र मोह धृतराष्ट्र सम,होता गरल समान
रेख बड़ी बारीक है,मूल तत्व को जान।।

प्रेम मोह को साथ रख,करें उचित व्यवहार।
सीमा में रख मोह को ,यही प्रेम आधार।।
हरिश्चंद्र के प्रेम का,दिव्य रूप पहचान।
रेख बड़ी बारीक है,मूल तत्व को जान।।

शत्रु मनुज के पांच ये,काम क्रोध अरु लोभ।
उलझे माया मोह जो,मन में रहे विक्षोभ।।
उचित समन्वय साधिए,जीवन का उत्थान
रेख बड़ी बारीक है,मूल तत्व को जान।।

अनिता सुधीर आख्या

Thursday, July 23, 2020

सावन

सावन गीत

बरसे मेघा बरसी अँखियाँ,
सावन हिय को तड़पाये।
धरती पर फैला सन्नाटा,
तम के बादल हैं छाए ।।

बाग बगीचे सूने लगते,
झूले मौन बुलाते हैं
याद सताती सखियों की अब,
कँगना शोर मचाते हैं
कजरी घेवर को मन तरसे,
तीजों पर काले साए।।

कांवड़िया यह राह देखता,
कैसे अब अभिषेक करें
दुग्ध धार गंगाजल अर्पण
आक धतूरा शीश धरें
बिल्व पत्र शंकर को प्यारा,
उनको अर्पण कर आए

विपदा चारों ओर खड़ी है,
बम बम भोले कष्ट हरो
नृत्य दिखा कर तांडव फिर से,
धरती के दुख दूर करो
सावन में मन की हरियाली,
लौट लौट फिर आ जाए

अनिता सुधीर










Saturday, July 18, 2020

क्यूँ लिखूँ

क्यूँ लिखूँ, मैं क्यूँ लिखूँ
यक्ष प्रश्न सामने खड़ा
इसका जवाब
चेतना अवचेतना में गड़ा
मैं मूढ़ अल्पज्ञानी खोज रही जवाब
और मस्तिष्क कुंद हुआ पड़ा
प्रश्न ओढ़े रहा नकाब
अब तक न मिला जवाब!
प्रश्न से ही प्रश्न?
अगर न लिखूँ ........
क्या बदल जायेगा!
अनवरत वैसे ही चलेगा
जैसे औरों के न लिखने से .....
मैं सूक्ष्म कण मानिंद
अनंत भीड़ में लुप्त
संवेदनाएं,वेग आवेग उद्वेलित करती
घुटन उदासी की धुंध
विचार गर्भ में ही मृतप्रायः
और मैं सूक्ष्म से शून्य की यात्रा पर..
 यह जवाब समाहित किये 
 में क्यूँ लिखूँ 
सूक्ष्म से विस्तार की
यात्रा के लिए ...










Tuesday, July 14, 2020

गजल

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तुम्हारी ख्वाहिशों को आसमाँ कोई नहीं देगा।
बढ़ी जब प्यास होगी तो कुआँ कोई नहीं देगा।।

लिया करता जमाना ये कभी जब इम्तिहाँ मेरा,
सहारा मतलबी जग में यहाँ कोई नहीं देगा ।

खड़ी की मंजिलें ऊँची टिकी जो झूठ पर रहती
यहाँ सच के लिए तो अब बयाँ कोई नहीं देगा ।।

चली अब नफरतों की आंधियाँ हर ओर ही देखो
रहें जो दहशतों में सब जुबाँ कोई नहीं देगा ।।

डसा करते रहे हरदम भरोसा हम किये जिन पर
कभी सुख चैन से जीने यहाँ कोई नहीं देगा ।।

तराशे पत्थरों को अब  उठाना कौन चाहे है
गिराने पर लगे सब आसमाँ कोई नहीं देगा।।

अनिता सुधीर
©anita_sudhir

Saturday, July 11, 2020

गजल


काफिया आर
रदीफ़     कर
2122  2122 2122 212

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कब सफर पूरा हुआ है जिन्दगी का हार कर ।
मंजिलों की शर्त है बस मुश्किलों को पार कर।।

साथ मिलता जब गमों का वो मजा कुछ और है
कर सुगम तू राह उनसे हाथ अब दो चार कर ।।

मुश्किलों के दौर में बस हार कर मत बैठना
आसमां को नाप लेंगे आज ये इकरार कर ।।

वक़्त की इन आँधियों में क्या बिखरना है सही
दीप जलता ही रहेगा इस हवा से प्यार कर।।

आशियाने आरजू के हैं वहीं  पर  टूटते ।
बेवजह यूँ हर किसी पर मत कभी इतबार कर।।

ख्वाहिशों के आसमां में जब  सितारे टाँकना
हौसला रख चाँदनी का जिंदगी उजियार कर ।।

अनिता सुधीर आख्या

नशा मुक्त भारत

नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान में तुच्छ योगदान  नशा धूम्रपान धुँए के बनते छल्लों में  परिवारों का सपना सोया पेट काट कर शुल्क चुका...