Thursday, January 13, 2022

मकर संक्रांति



मकर संक्रांति

मकर राशि में सूर्य जब, करें स्नान अरु दान।

उत्सव के इस देश में, संस्कृति बड़ी महान ।।


सुत की मङ्गल कामना, माता करे अपार।

तिल लड्डू को पूज कर,करे सकट त्यौहार।।


मूँगफली गुड़ रेवड़ी,धधक रही अंगार ।

नृत्य भाँगड़ा लोहड़ी,करे शीत पर वार ।।


खिचड़ी पोंगल लोहड़ी, मकर संक्रांति नाम।

नयी फसल तैयार है, झूमें खेत तमाम ।।


रंग बिरंगी उड़ रही ,अब पतंग चहुँ ओर ।

मन पाखी बन उड़ रहा, पकड़े दूजो छोर।।


जीवन झंझावात में ,मंझा रखिये थाम ।

संझा दीपक आरती ,कर्म करें निष्काम ।।


उड़ पतंग ऊँची चली, मंझा को दें ढील।

मंझा झंझा से लड़े ,सदा रहे गतिशील।।


ऋतु परिवर्तन जानिये, नव मधुमास बहार।

पीली सरसों खेत में ,धरा करे शृंगार।।


उर में प्रेम मिठास से, लिखिए पर्व विधान।

संकट के बादल छँटें,आये नव्य विहान।।


अनिता सुधीर आख्या


Wednesday, January 12, 2022

मैं विवेकानंद...




मैं .......विवेकानंद बोल रहा हूँ

मैं बदलता भारत देख रहा हूँ

मैं युवा भारत की आहट सुन रहा  हूँ

मैं ये सोच आनंदित हो रहा हूँ 

   कि तुम

लक्ष्य निर्धारित कर ,कर्म पथ पर बढ़ चले हो

मार्ग में शूल हैं पर निडर चलते चले हो

सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर खड़े

सपनोँ को पूरा करने की ऊँची उड़ान भरे हो


मुझे तुम पर पूरा विश्वास है ,

पर

कभी ये देख काँप जाता हूँ

जब तुम्हें नशे की गिरफ्त में पाता हूँ

नारी का अपमान सहन न कर पाता हूँ

भ्रष्टाचार में लिप्त तुम्हें देख नहीं पाता हूँ

अपशब्द देश के लिये सुन नही पाता हूँ

हिंदी की अवस्था पर घबरा जाता हूँ।

संस्कृति के पतन पर व्यथित हो जाता हूँ



मैं  युवा भारत से आह्वान करता हूँ 

सांस्कृतिक विरासत को सहेज आगे बढ़ो

चरित्र निर्माण,पौरुष में सतत लगे रहो

तुम्हारे नाम पर भी दिवस के नाम  हो

सत्कर्म करो ऐसे, जग मे अमर  रहो

मैं ........विवेकानंद  आह्वान करता हूँ



अनिता सुधीर आख्या

Tuesday, January 11, 2022

तुम्हारे हाथ


तुम्हारे गर्म हाथों की गर्मी 
रूह पर जमी बर्फ पिघला देती है..
तुम्हारे हाथों की वो प्यार भरी थपथपाहट
सारे गिले शिकवे मिटा देती है..
शायद ये जानते हो तुम 
जानते हो न तुम..
फिर क्यों समेटे रहते हो अपने गर्म हाथ तुम..

Monday, January 10, 2022

विश्व हिंदी दिवस


विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनाएं

हिंदी

*मत्तगयंद सवैया*

।।१।।

छंद विधा लय शिल्प सजा रस,रूप अनूप समाहित हिंदी।।

भोजपुरी ब्रज मैथिल में सज,अद्भुत भाव प्रवाहित हिंदी।।

काव्य रचा कर श्याम सखा पर, प्रीत लिखे अवगाहित हिंदी।

कालजयी बन घूम रही शुभ,मानस शुद्ध सुवासित हिंदी।।

।।२।।

भारत की पहचान बनी अब,दिव्य ललाट सुशोभित हिंदी।

विस्तृत रूप लिए चलती नित, देश विदेश प्रचारित हिंदी।।

पोस रही इसको जब संस्कृत,है इतिहास प्रमाणित हिंदी।

मान बढ़ा नित उन्नत होकर,उत्तम भाष्य सुभाषित हिंदी।।


अनिता सुधीर आख्या


Saturday, January 8, 2022

बोझ

लघुकथा

अदिति ....  आप अपनी अल्मारी खोले क्या सोच रहीं  हैं। कुछ परेशान लग रहीं हैं आप ,क्या बात है माँजी!
पुनीता ....कुछ नहीं बेटा ,अपनी ख्वाहिशों और चाहतों का बोझ देख रही हूँ ।
अदिति ....  माँजी साफ साफ बताइए ,पहेलियां क्यों बुझा रही हैं  ,प्लीज बताइये न क्या हुआ!
पुनीता .....अल्मारी में भरी साड़ियां और कपड़े देख रही हूँ , बेटा ,आवश्यकता न होने पर भी कितनी ही साड़ियां  खरीदती रही । तुम्हारे  पापा ने कई बार कहा भी कि  इतनी फिजूलखर्ची ठीक नहीं है ।इसमें से तो कई साड़ियां  शायद एक दो बार ही पहनी हो ।
अब ये मन पर भी बोझ हो रहीं है । सोच रही हूँ मेरे बाद ......
अदिति ... माँ जी आप कुछ भी बोल देती हैं ऐसा न कहिये
पुनीता ...  चलो बेटा अब तुम मेरा बोझ कम करने में मेरी मदद  करो ।  बहुत से ऐसे लोग होंगे जिन्हें इन कपडों की  बहुत आवश्यकता  होगी ।
चलो उन्हें दे आते हैं , उनकी जरूरत भी पूरी हो जाएगी और मेरे मन का बोझ भी  कम हो जाएगा ।
संतुष्टि का  भाव  लिये वो साड़ियां निकालने लगी ...

अनिता सुधीर

Wednesday, January 5, 2022

गीतिका

आँकड़े देख जो आज डरता नहीं ।
चोट खाये बिना क्यों सँभलता नहीं ।।

जिंदगी चार दिन की कहानी बनी
आपदा काल अब भी खिसकता नहीं।।

भूल कर्त्तव्य अब कर रहे गलतियां,
देश का हाल उनको अखरता नहीं।।

चार जन से कहाँ दूरियाँ सब रखें,
मुख कवच भीड़ में आज लगता नहीं।।

वो गिनाने लगे नीति की ख़ामियां,
दूध का दाँत भी जब निकलता नहीं।।

दुश्मनों की कुटिल चाल रहती सदा
भूल क्यों वो रहे स्वार्थ टिकता नहीं।।

अनिता सुधीर आख्या

Saturday, January 1, 2022

ग़ज़ल


टूटते ख्वाब की जो कहानी बनी।

लफ़्ज़ बिखरी हुई जिंदगानी बनी।।


हर्फ दर हर्फ जो उम्र लिखती रही

क्यूं उसी कारवाँ की रवानी बनी।।


रात परछाईयों की सहमती दिखे

क्या नज़र भी अभी ख़ानदानी बनी।।


ग़म सिखाते चले मुस्कुराना हमें

ज़िंदगी फिर यही आसमानी बनी।।


राख जो चिठ्ठियों की छिपा कर रखी

याद उस दौर की अब निशानी बनी ।।


अनिता सुधीर










आयुर्वेद दिवस

शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग।  वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...