#माँ चंद्र घण्टा के चरणों में पुष्प#
Monday, April 4, 2022
माँ चंद्रघंटा
Saturday, April 2, 2022
Friday, April 1, 2022
परीक्षा उत्सव
परीक्षा
रूप घनाक्षरी
कितने ही प्रकार से जीवन परीक्षा लेता
जीत सदा होती कब,कभी मिलती है हार।
दुखी कभी होना नहीं, छोड़ दें अवसाद को
परीक्षा को पर्व मान, करें सदैव सत्कार।।
कर्म पथ हो अडिग, हर पल निडर हो
जो भी परिणाम आये, उसको ले अँकवार।
श्रेष्ठ अपना दीजिये धीरज वरण कर,
सबके प्रश्न भिन्न हैं ,यही जीवन का सार।।
अनिता सुधीर
Monday, March 28, 2022
गीतिका
शूल को पथ से हटाने का मजा कुछ और है।
वीथिका को नित सजाने का मजा कुछ और है।।
व्यंजना या लक्षणा में भाव हृद के व्यक्त हों
छंद को फिर गुनगुनाने का मजा कुछ और है।।
क्लांत बैठा हो पथिक जब जिंदगी से हार कर
पुष्प उस पथ में बिछाने का मजा कुछ और है।।
पंख सपनों को लगाकर दूर बाधा को करें
मुश्किलों के पार जाने का मजा कुछ और है।।
चाल चलकर काल निष्ठुर ओढ़ चादर सो रहा
लालिमा में चहचहाने का मजा कुछ और है।।
पीर की सामर्थ्य क्यों अवसाद को नित जोड़ती
वेदना में मुस्कुराने का मजा कुछ और है।।
कौन हूँ मैं क्या प्रयोजन द्वंद्व अंतस ने लड़ा
लक्ष्य को फिर से जगाने का मजा कुछ और है।।
अनिता सुधीर
Saturday, March 26, 2022
सपने
कुंडलिया
1)
सपने जग कर देखिए, बीते काली रात।
खुले नैन से ही सधे, नूतन नवल प्रभात।।
नूतन नवल प्रभात, लक्ष्य दुर्गम पथ जानें ।
करके बाधा पार, मिले मंजिल तय मानें ।
सपनों का संसार, सजाएँ नित सब अपने।
कठिन लक्ष्य को भेद, और फिर देखें सपने।।
2)
अपने जीवन को गढ़ें, शिल्पकार बन आप।
छेनी की जब धार हो, अमिट रहेगी छाप।।
अमिट रहेगी छाप, सदा रखिये मर्यादा ।
सच्चाई का मार्ग, नहीं हो झूठ लबादा।।
सतत हथौड़ा सत्य का,पूर्ण हो सारे सपने ।
नैतिकता आधार,गढ़ें सब सपने अपने।।
अनिता सुधीर आख्या
Wednesday, March 23, 2022
शहीदी दिवस
अब आत्म बोध का हो विचार।
सुन मातु भारती की पुकार।।
बलिदान कृत्य से अमर आज
हम चुका सकें उनका उधार।।
Tuesday, March 22, 2022
जल प्रबंधन
नशा मुक्त भारत
नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान में तुच्छ योगदान नशा धूम्रपान धुँए के बनते छल्लों में परिवारों का सपना सोया पेट काट कर शुल्क चुका...
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मकर संक्रांति मकर राशि में सूर्य जब, करें स्नान अरु दान। उत्सव के इस देश में, संस्कृति बड़ी महान ।। सुत की मङ्गल कामना, माता करे अपार। तिल लड...
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पनिहारन लिए भार मटकी का चलती कोस अढ़ाई पनिहारन धरा तरसती अब बूँदों को हुआ वक्ष उसका खाली जीव जगत तब व्याकुल रोया कहाँ गया उसका माली तपी ...
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दक्षिणा *** 'मॉम पंडित जी का पेमेंट कर दो ' सुन कर इस पीढ़ी के श्रीमुख से संस्कृति कोने में खड़ी कसमसाई थी सभ्यता दम तोड़ती नजर आई थी ...



