Saturday, February 29, 2020

वैमनस्य

रस्सी जलती ,ऐंठन रहती
कब  पकड़ोगे दूजा छोर
वैमनस्य का कारण ढूंढो
झांक जरा भीतर की ओर


एक डाल के सब पंछी है,
जग में रहते कोयल ,काग ,
जो हो मीठी,कर्कश वाणी
रखिये पर उर में अनुराग ।
मत बनिये मन कोयल काला
तन काले का भावे शोर
वैमनस्य का कारण ढूंढो
झांक जरा भीतर की ओर।


अब मौसम बदले पल पल में
जब तब खेलें खूनी फाग
ठंडक में है गरमी लगती
अपनी ढपली अपना राग।
दिया सीख दूजों को करते,
उर सागर में बसता चोर ,
वैमनस्य का कारण ढूंढो
झांक जरा भीतर की ओर।


सहन शक्ति सीता की भूले
भूले पन्ना माँ  का त्याग,
बोझ अहम् का बढ़ता जाता,
जले स्वार्थ की उर मेँ आग।
घना  कोहरा दूर भगाओ
प्रेम रश्मि से हो अब भोर
वैमनस्य का कारण ढूंढो
झांक जरा भीतर की ओर

©anita_sudhir

Friday, February 28, 2020

परीक्षा

परीक्षा काल निकट आया
सबका चैन उसने चुराया ।
कहानी घर घर की हुई
तू दिन भर क्या करता है ?
राजू देखो कितना पढ़ता है
उससे नंबर कम आये
तो मोबाइल तुम नही पाये ।
ऐसी बातें घर घर की
बच्चे पाते ज्यादा भाव
नहीं रखते कोई अभाव
 सँग में देते ये तनाव
दूध बादाम तुम खा लो
 प्रतियोगिता में दौड़ लगा लो
सबसे आगे रहना है
कम से कम सत्तानवे तो करना है ।
दिन वो जब शुभ आया
परीक्षा कक्ष में खुद को पाया
देख कर पेपर सिर चकराया
गणित के सवालों ने घुमाया
भौतिक के सिद्धांतों में उलझे
कहीं रासायनिक समीकरण गड़बड़ाया
सबकी महत्वाकांक्षाओं ने सिर उठाया ।
हक्का बक्का  वो खड़ा हुआ
अवसादों में घिरा हुआ
जीने से आसान मौत लगी
उसे प्यार से गले लगाया
और सन्नाटा ....अंधकार
अखबार की सुर्खी बनी
एक प्रश्नचिन्ह
समाज के माथे बना गया
दोष कहाँ
शिक्षा व्यवस्था में या
परीक्षा  प्रणाली में
प्रतिस्पर्धा या
प्रतिद्वंदिता में
शिक्षक के पठन पाठन में
या छात्र के मानसिक स्तर में
मां पिता के उम्मीदों में
कारण जो भी रहा
जिंदगी टूटती है
और यदि ये भार सहन नहीं
तो जीवन में कदम कदम पर परीक्षा
उसका  क्या ?

अनिता सुधीर





















Wednesday, February 26, 2020

पाषाण

अनगढ़  पुरातन  काल पाषाण
जीवन था पत्थर पर निर्भर
जली थी अग्नि घर्षण से
मानव दिल में था आकर्षण।
पाषाण से करते  आखेट
साधन भरण पोषण का ,
आवश्यकता जीवन यापन
अनगढ़ पुरातन काल पाषाण।
               क्या पता  गर्भ में !
भविष्य अब यह होगा
अब अग्नि से हुए घृणा पूर्ण कार्य
मानव दिल  हुआ पाषाण
बढ़ता  हृदय में विकर्षण ।
अब पत्थर से दे रहे आघात
घात लगा  निर्बल को
चीखें ,और त्रास ही त्रास
क्यों नहीं पिघलता मानव पाषाण।
दर्द संवेदना  लुप्त हो रहीं
व्यथित नहीं,
परपीड़ा से हृदय ।
परिवार अपने में सिमटते हुए ।
पाषाण मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा
भूखे नंगे दम तोड़ते
पाषाण मूर्ति पर सुसज्जित आभूषण
मानव मत बन तू पाषाण
अनगढ़ पुरातन काल  पाषाण ।
मत जाओ पुरातन काल
आया एक कालखंड बाद
ये सुविधापूर्ण आधुनिक काल
साध इसे संतुलन ,आकर्षण से
मानव मत बन तू पाषाण
अनगढ़ पुरातन काल पाषाण ।

अनिता सुधीर"आख्या"
#हिंदी_ब्लॉगिंग

Tuesday, February 25, 2020

दोहावली

ताकत के मद में रहे ,कुछ सत्ता आरूढ़ ।
करते अनर्थ !अर्थ का,बुद्धिहीन ये मूढ़ ।।

कार्य अतिरिक्त सौंपते ,हनन हुये अधिकार।
नियुक्ति तदर्थ कीजिये,सुचारुता हो सार ।।

शंका अनर्थ निर्मूल है ,कर समर्थ विश्वास।
ले तदर्थ की चाह अब ,पूरी करिये आस ।।

घृणित कार्य उन्माद में,भूलते राष्ट्रवाद।
आग लगाते देश में,ये कैसा अवसाद ।।

दूर करें अवसाद को,छोड़ें वाद विवाद ।
देश प्रेम उन्माद में,फूँक बिगुल का नाद ।।

गौरान्वित हैं हम सभी,हुआ देश आजाद ।
आजादी के नाम पर ,कैसा करें जिहाद।।

धर्म जाति बदलाव का ,मुद्दा प्रेम जिहाद ।
असली मुद्दा  भूलते ,....फैलाते उन्माद ।।

हुआ मार्ग अवरुद्ध ये ,निकल पड़ी बारात ।
नाचें गाते  झूमते ,...........भूले यातायात ।।

द्वारे वंदनवार है  ,आयी शुभ बारात ।
डोली बेटी की सजी ,खुशियों की सौगात ।।

अब दहेज की मांग पर,वापस हो बारात ।
बेटी कम मत आंकिये,बने सहारा तात ।।

वो निरीह रोता रहा ,लौट गई बारात ।
बिकने को तैयार थे ,नहीं सुने वो बात ।।

विष का प्याला पी गये ,वो सुकरात महान ।
जीवन दर्शन उच्चतम, कैसे करें बखान ।।

मसि कागद छूये नहीं,दोहे रचे कबीर ।
कालखंड के सत्य  में ,उपजी मन की पीर।।

सत्य आचरण जानिये  ,कहते दास कबीर ।
रूढ़िवाद पर चोट कर ,कही बात गंभीर।।

#hindi_blogging#हिन्दी_ब्लॉगिंग

अनिता सुधीर "आख्या"

Sunday, February 23, 2020

पीर विरह की


नव गीत
निश्चल छन्द पर आधारित
***
पंक्ति
पीर जलाती आज विरह की ,बनती रीत।
**
पीर जलाती आज विरह की,
बनती रीत,
मिले प्रेम में घाव सदा से,
बोलो मीत ।

विरह अग्नि में मीरा करती ,
विष का पान,
तप्त धरा पर घूम करें वो,
कान्हा गान ।
कुंज गली में  राधा ढूँढे ,
मुरली तान ,
कण कण से संगीत पियें वो,
रस को छान ।
व्यथित हृदय से कृष्ण खोजते,
फिर वो प्रीत ,
पीर जलाती आज विरह की,
बनती रीत ।

तड़प तड़प कर कैसे जीये ,
राँझा हीर,
अलख निरंजन जाप करे वो ,
टिल्ला वीर।
बेग!माहिया बन के तड़पे ,
रक्खे धीर,
विरह अग्नि सोहनी की बुझे ,
नदिया तीर।
 ब्याह रचाते चिनाब में वो ,
मौनी मीत ,
पीर जलाये आज विरह फिर,
बनती रीत ।

जन्मों के वादे कर हमसे,
पकड़ा हाथ,
विरह की वेदना को सहते ,
छोड़ा साथ।
बिना गुलाल अब सूखा फाग,
सूना माथ,
घर लगे अब भूत का डेरा,
झेलें क्वाथ ।
पत्तों की खड़खड़ भी करती,
है भयभीत ,
पीर जलाये आज विरह फिर,
बनती रीत ।













Saturday, February 22, 2020

आजकल


मापनी - गालगा गालगा गालगा गालगा
स्त्रगविनि छन्द
समान्त - इयाँ
पदान्त - आजकल
गीतिका
*******

खोलते ही कहाँ खिड़कियां आजकल ,
झाँकती रह गयीं  रश्मियां आजकल ।

प्यार की चाह में मन धरा सूखती ,
नफरतों की गिरे बिजलियाँ आजकल।

बोलते ही रहे हम सदा तौलकर,
प्रेम में फिर बढ़ी दूरियां आजकल ।

खो गये भाव अब शब्द मिलते नहीं
भेजते हैं कहाँ पातियाँ आजकल ।

शाम होने लगी जो सफर की यहाँ ,
अब डराने लगी आंधियाँ आजकल।

दाँव देखो सियासी चले जा रहे
घर जला सेंकते रोटियां आजकल ।
अनिता सुधीर

Friday, February 21, 2020

शिव शंभु

शिव निराकारी है ,और शंकर साकार रूप लिये हुए। साकार भक्ति  हम सभी कर लेते है 
शिव और शिवत्व को पाना साधना है ।
इस को छन्द के माध्यम से

गोपी  छन्द आधारित मुक्तक
विधान- कुल 15 मात्रा, आदि त्रिकल+द्विकल,
अंत गा पर अनिवार्य और तुकांत

विधाता    ब्रह्मा  जी के लिए
रुद्र       शिव

नाम शिव का जपते रहिये ,
भक्ति शिव की करते रहिये,
लोक त्रिय के स्वामी भोले,
शम्भु शिव दुख हरते रहिये ।

शम्भु,शिव में भेद समझिये
शम्भु को साकार  समझिये ।
रूप की पूजा सरल बड़ी
ज्ञान शिव के लिये  समझिये ।

गले में साँपों की माला,
हाथ में डमरू मतवाला ,
जटा से गंगा उतरी  है,
ओढ़ते हैं मृग की छाला।

उमापति शिव अविरामी है
सत्य शिव सुंदर स्वामी हैं
काल के महाकाल बाबा
जगत के अंतरयामी हैं ।

सृष्टि के निर्माता शिव हैं,
विधाता विष्णु रुद्र शिव हैं,
ज्योति का रूप  धारण करे
ज्ञान के वरदाता शिव हैं।

अनिता सुधीर

आओ कान्हा मन हल्का कर लें

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं  आओ कान्हा ! मन हल्का कर लें रस्म निभाने आते उत्सव घर की चौखट सकुचाए  दुविधा लेकर खड़ा हुआ मन स्वागत कैसे क...