Wednesday, August 26, 2020

प्रतीक्षा



बजे निगोड़ी यह साँकल कब 
आस टँगी ही रहती द्वारे 

सपनें बोती रही प्रतीक्षा 
कब फलते देखे वृक्ष सभी 
आँसू घर की चौखट धोए
आँखें पाथर सी बनीं तभी
सुधियाँ आकर करें हिलोरें
याद दिलातीं वादे सारे।।
बजे निगोड़ी..

कहे व्यथा रंगोली रोकर
शृंगार अधूरा अब होता
व्यथित हृदय कब गीत रचाता
टुकड़ों में शब्दों को बोता
अकुलाहट जब शोर मचाता
नयन देखते दिन में तारे।।
बजे निगोड़ी..

पगचापों की आहट रूठी
ढूँढ़े पाँवो की परछाई
हाथ पसीजे लिये रिक्तता
चौड़ी होती जाती खाई
पल पल बीते सदियों जैसे
कुटी मौन हो राह निहारे।।
बजे निगोड़ी..

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