मंथरा घर-घर विराजी
झूठ थिर-थिर नच गया
वृक्ष की मजबूत टहनी
भाग्य पर इठला रही
नित कुटिलता जड़ हिलाती
वेदना है अनकही
पात फँसते चाल में जो
बंधनों का सच गया।।
कान कौवा ले उड़ा जो
दौड़ कर क्यों काग पकड़े
भरभरा विश्वास गिरता
प्रेम को जब लोभ जकड़े
सोच कुबड़ी जीतती जो
पल अकेला बच गया ।।
चाल चलकर काल निष्ठुर
ओढ़ चादर सो रहा
पीप की दुर्गंध सह कर
घाव रिसता रो रहा
मेहंदी भीगी पलक से
और अम्बर रच गया।।