Friday, October 22, 2021

मंथरा


 मंथरा घर-घर विराजी

झूठ थिर-थिर नच गया


वृक्ष की मजबूत टहनी

भाग्य पर इठला रही

नित कुटिलता जड़ हिलाती

वेदना है अनकही

पात फँसते चाल में जो

बंधनों का सच गया।।


कान कौवा ले उड़ा जो

दौड़ कर क्यों काग पकड़े

भरभरा विश्वास गिरता

प्रेम को जब लोभ जकड़े

सोच कुबड़ी जीतती जो

पल अकेला बच गया ।।


चाल चलकर काल निष्ठुर

ओढ़ चादर सो रहा

पीप की दुर्गंध सह कर

घाव रिसता रो रहा

मेहंदी भीगी पलक से

और अम्बर रच गया।।

Thursday, October 21, 2021

गीतिका


 छाए जब घनघोर अँधेरा,मन में आस जगाता कौन।

बीच भंवर में नाव फँसी है,इससे पार लगाता कौन।।


खड़ा अकेला बचपन सहमा,एकल होते अब परिवार

दादी नानी के किस्से का,नैतिक पाठ पढ़ाता कौन।। 


सामाजिक ताने-बाने का,भूल गए हैं लोग महत्व 

परंपरा जब बोझ लगेगी,होगा युग निर्माता कौन।। 


कथनी-करनी का भेद बड़ा,व्यथित हृदय के हैं उद्गार ।

एक मुखौटा ओढ़ खड़े हैं, इसको आज हटाता कौन।।


शक्ति रूप में देवी पूजन,फिर बेटी पर अत्याचार

मर्यादा आघात सहे जब, इसका मान बचाता कौन।।


एक दिवस अठखेली कर, हिंदी घूमी चारों ओर। 

शेष समय चुपचाप पड़ी है,नित्य महत्व बढ़ाता कौन।।


ऋषि मुनियों की भारत भू पर, वैदिक संस्कृति का इतिहास।

सत्य सनातन धर्म हमारा, इसको आज सिखाता कौन।।



अनिता सुधीर आख्या


Wednesday, October 20, 2021

पनिहारिन


 

पनिहारन

लिए भार मटकी का चलती 

कोस अढ़ाई पनिहारन


धरा तरसती अब बूँदों को

हुआ वक्ष उसका खाली 

जीव जगत तब व्याकुल रोया 

कहाँ गया उसका माली

तपी दुपहरी कूप खोदते 

आज कागजों में चारन

लिए भार मटकी का चलती 

कोस अढ़ाई पनिहारन


जूठे वासन आँगन देखें 

सास देखती अब चूल्हा

रिक्त पतीली बाट जोहती 

कौन पकाएगा सेल्हा 

तपिश सूर्य  से दग्ध हुई वो 

ज्येष्ठ धूप में बंजारन

लिए भार मटकी का चलती 

कोस अढ़ाई पनिहारन


नुपुर चरण को जब तब छेड़े

पाँव बचाते पत्थर तब

भरी गगरिया छलक रही जो 

बहा परिश्रम झर झर तब

नीर उमड़ता जो नयनों  से 

कहे कहानी कुल तारन

लिए भार मटकी का चलती 

कोस अढ़ाई पनिहारन


अनिता सुधीर आख्या


Tuesday, October 19, 2021

शरद पूर्णिमा

 शरद पूर्णिमा की शुभकामनाएं



मंगल


मंगलकारी रात में, हो अमरित बरसात।

शरदपूर्णिमा चाँद से, बहते हृदय प्रपात।।

बहते हृदय प्रपात, शुभ्रता जीवन भरती।

निकट हुए राकेश, धरा आलिंगन करती।।

रखा पात्र में खीर, बना औषधि उपचारी।

सभी कला में पूर्ण,  कलानिधि मंगलकारी।।


अनिता सुधीर आख्या

पिता

मेरे संग्रह देहरी गाने लगी से...

*पिता*


भाग्य की हँसती लकीरें

जब पिता उनको सजाता


पाँव नन्हें याद में अब

स्कन्ध का ढूँढ़े सहारा

उँगलियाँ फिर काँध चढ़ कर

चाहतीं नभ का किनारा

प्राण फूकें पाँव में वो

सीढ़ियाँ नभ तक बनाता।।


जोड़ता संतान का सुख

भूल कर अपनी व्यथा को

जब गणित में वो उलझता

तब कहें जूते कथा को

फिर असीमित बाँटने को

सब खजाना वो लुटाता।।


छत्रछाया तात की हो

धूप से जीवन बचाते

दुख बरसते जब कभी भी

बाँध छप्पर छत बनाते

और अम्बर हँस पड़ा फिर 

प्यास धरती की बुझाता।।


अनिता सुधीर

Monday, October 18, 2021

लिव इन रिलेशनशिप

 देहरी गाने लगी   (मेरे एकल संग्रह से)


लिव इन रिलेशनशिप


डगमगाती सभ्यता का

अब बनेगा कौन प्रहरी


सात फेरे बोझ लगते

नीतियों के वस्त्र उतरें

जो नयी पीढ़ी करे अब

रीतियाँ सम्बन्ध कुतरें

इस क्षणिक अनुबंध को अब

देखती नित ही कचहरी।।


जब सृजन आधार झूठा 

तब नशे ने दोष ढूँढ़ा

सत्य बदले केंचुली जो

चित्त ने तब रोष ढूँढ़ा

फल घिनौने कृत्य का है

हो रही संतान बहरी।।


पत्थरों ने दूब कुचली

सभ्यता अब रो रही है

माँगती उत्तर सभी से

चेतना क्या सो रही है।।

आँधियों के प्रश्न पर फिर 

ये धरा क्यों मौन ठहरी।।

Sunday, October 17, 2021

गेरुए सी छाप तेरी

गेरुए सी छाप तेरी*

मखमली सी याद में है
गेरुए सी छाप तेरी

साथ चंदन सा महकता
प्रेम अंगूरी हुआ है
धड़कनों की रागिनी में
रूप सिंदूरी हुआ है
सोचता मन गाँव प्यारा
ये डगर रंगीन मेरी ।।

देह के अनुबंध झूठे
रोम में संगीत बहता
बाँसुरी की नाद बनकर
दिव्यता को पूर्ण करता
जो मिटा अस्तित्व तन का
अनवरत अब काल फेरी।।

जब अलौकिक सी कथा को
मौन की भाषा सुनाती
उर पटल नित झूमता सा
प्रीत नूतन गीत गाती
स्वप्न को बुनते रहे हम
कष्ट की फिर दूर ढेरी।।

आओ कान्हा मन हल्का कर लें

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं  आओ कान्हा ! मन हल्का कर लें रस्म निभाने आते उत्सव घर की चौखट सकुचाए  दुविधा लेकर खड़ा हुआ मन स्वागत कैसे क...