पीर विरह की
पीर जलाती रही विरह की
बनती रीत।
मिले प्रेम में घाव सदा क्यों
बोलो मीत।।
विरह अग्नि में मीरा करती
विष का पान
तप्त धरा पर घूम करें वो
कान्हा गान
कुंज गली में राधा ढूँढे
मुरली तान
कण कण से संगीत पियें वो
रस को छान
व्यथित हृदय से कृष्ण खोजते
फिर वो प्रीत
पीर जलाती ..
तड़प तड़प कर रहते होंगे
राँझा हीर
अलख निरंजन जाप करे वो ,
टिल्ला वीर
बेग!माहिया बन के तड़पे ,
रक्खे धीर,
विरह अग्नि सोहनी की बुझती
नदिया तीर।
ब्याह चिनाब में फिर रचाये
मौनी मीत
पीर जलाये..
जन्मों के वादे कर हमसे
पकड़ा हाथ
अब विरह वेदना को सहते
छोड़ा साथ
बिना गुलाल अब सूखा फाग
सूना माथ
लगे भूत का डेरा घर अब
झेलें क्वाथ ।
पत्तों की खड़खड़ भी करती
अब भयभीत
पीर जलाए..
अनिता सुधीर