Tuesday, November 30, 2021

दोहे

चिंगारी अफवाह की,झूठ पसारे पाँव।
उठता रहता है धुँआ,सत्य माँगता ठाँव।।

जले ज्योति संकल्प की, सतत मनोबल साध।
खड़ी सफलता द्वार पर, लेकर हर्ष अगाध।।

झूठ लबादा ओढ़ के,चकाचोंध में मस्त।
विज्ञापन बाजार में,मानव जीवन त्रस्त।।

नेता बाँटें रेवड़ी, नाम दिए अनुदान।
पासा फेंकें लोभ का,राजनीति विज्ञान।।

सरकारी अनुदान का,करिए उचित प्रयोग।
जनता का धन है लगा, भूल रहे यह लोग।।

अनिता सुधीर

Sunday, November 28, 2021

शून्यता


 

बोले मन की शून्यता

क्यों डोले निर्वात


कठपुतली सी नाचती

थामे दूजा डोर 

सूत्रधार बदला किये 

पकड़ काठ की छोर

मर्यादा घूँघट लिए

सहे कुटिल आघात।।


चली ध्रुवों के मध्य ही 

भूली अपनी चाह 

पायल की थी बेड़ियां

चाही सीधी राह

ढूँढ़ रही अस्तित्व को 

बहता भाव प्रपात।।


अम्बर के आँचल तले

नहीं मिली है छाँव

कुचली दुबकी है खड़ी

आज माँगती ठाँव

आज थमा दो डोर को

पीत पड़े अब गात।।


चित्र गूगल से साभार

Thursday, November 25, 2021

सृजन पीर का माधुर्य


चित्र गूगल से साभार

*सृजन पीर का माधुर्य*

सृजन पीर माधुर्य लिए
आनन्द लुटाती है

क्षणिक चित्र उर माटी में
दृश्य बीज अकुलाए
मसि कागद जब खाद बने
शब्द कहाँ सो पाए
सृजनहार कवि फिर जन्मा
वो कलम लुभाती है।।

बीज अँधेरे में खेले
करे उजाला खटखट
चीर धरा को फिर ओढ़े
हरित आवरण झटपट
खड़े बिजूका हाँड़ी ले
वो धरा सुहाती है।।

स्वप्न सींचते कोख सदा
आशाओं का स्पन्दन
करे गर्भ जब अठखेली
तब सरगम सी धड़कन
माँ जन्मी अपने तन जब
वो भाव अघाती है।।

अनिता सुधीर आख्या

 

Tuesday, November 23, 2021

गीतिका

छन्द से श्रृंगार करती,नित्य पावन गीतिका।
बैठती उपवन सजा कर, हिन्द आँगन गीतिका।।

शिल्प का जामा पहन कर, लेखनी में कूकती,
झूम कर साहित्य कहता,है लुभावन गीतिका।।

भाव की जब गूढ़ता को,पंक्तियां दो ही कहें
कुंभ में वारीश भरती,दिव्य चिंतन गीतिका।।

लालिमा नीरव लिए जब,शब्द इठलाते चले,
काव्य की फिर रागिनी में, बिम्ब मंथन गीतिका।।

गा रहीं चारों दिशाएं,हो अमर चिरकाल तक,
हैं प्रफुल्लित फिर जनक भी, देख गुंजन गीतिका।।

Monday, November 22, 2021

बिंदिया

 

चित्र गूगल से साभार

बिंदिया ललाट की


किंशुक लाली हूँ माथे 

करती हँसी ठिठोली


गुलमोहर के रंग चुरा

मुखड़ा लगता तपने

दृग पगडण्डी फिर देखे

कुछ कजरारे सपने

आहट पगचापों की तब

करती आँख मिचोली।।

किंशुक लाली हूँ माथे 

करती हँसी ठिठोली।।


भिन्न रूप आकार लिए

सूर्य बिम्ब भी होता

दूज चाँद श्यामल मुख पर

ओढ़ सादगी सोता

बिंदु वृत्त का रूप खिला

फबती रही मझोली।।

किंशुक लाली हूँ माथे 

करती हँसी ठिठोली।।


दर्पण के आलिंगन या

प्रणय साक्ष्य में रहती

नींद चोर के ठप्पे से

स्वेद कणों सी बहती

जब त्रिनेत्र का रूप धरूँ

थर थर काँपे गोली।।

किंशुक लाली हूँ माथे 

करती हँसी ठिठोली।।


अनिता सुधीर आख्या


Wednesday, November 17, 2021

कृतज्ञता



कुंडलिया


आभारी हृद से रहें, लेकर भाव कृतज्ञ।

शब्द मात्र समझें नहीं, यह जीवन का यज्ञ।।

यह जीवन का यज्ञ, मनुज का धर्म सिखाता।

समता का ले भाव, जगत का दर्प मिटाता।।

पूरक बने समाज, मान के सब अधिकारी।

करके नित्य प्रयोग, अर्थ समझें आभारी।।


अनिता सुधीर आख्या

नशा मुक्त भारत

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