Wednesday, September 2, 2020

चंचल मन


चंचल मन को गूँथना
सबसे टेढ़ी खीर

**
घोड़े सरपट भागते
लेकर मन का चैन
आवाजाही त्रस्त हो
सुखद चाहती रैन
उछल कूद कर कोठरी
बनती तभी प्रवीर।।
चंचल मन..

भाड़े का टट्टू समझ
कसते नहीं लगाम
इच्छा चाबुक मार के
करती काम तमाम
पुष्पित हो फिर इन्द्रियाँ
चाहें बड़ी लकीर।।
चंचल मन..

भरी कढ़ाही ओटती
तब जिह्वा का स्वाद
मंद आँच का तप करे
आहद अनहद नाद
लोक सभी तब तृप्त हो
सूत न खोए धीर।।
चंचल मन..

अनिता सुधीर आख्या

10 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  2. रचना को स्थान देने के लिये हार्दिक आभार आ0

    ReplyDelete
  3. सुंदर व्यंजना वाला सुंदर नवगीत सखी।

    ReplyDelete

नवगीत

हठी आज हठी ने ठान लिया है अपने को ही नोच नीति नियम क्यों ताखे पर रख अनुशासन का  कभी स्वाद चख मनमानी जब उड़े हवा में  घर में रहना सोच किसकी प...