कुंडलिया
अलाव
रातें ठंडी हो रहीं ,जलने लगे अलाव ।
रूप निराले शीत के,अलग अलग हैं भाव।।
अलग अलग हैं भाव ,कहीं मौसम की मस्ती,
रहता कहीं अभाव,सड़क पर रातें कटती।
करती क्या सरकार,करे क्या खाली बातें,
हम सब करें प्रयास ,सुखद हो सबकी रातें।।
लघुकथा पोशाक चाय का कप पकड़े आरती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी थी। वेदना उसके मुख पर स्पष्ट दृष्टिगोचर थी । राजेश : क्या हुआ आरती पत्नी को झकझोरत...
बहुत उम्दा
ReplyDeleteजी हार्दिक आभार
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteजी सादर धन्यवाद आ0
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