Wednesday, February 19, 2020

कल्पना



आस लिये मृग तृष्णा की,छूना चाहा नभ सारा,
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

नीर की जब प्यास लगती,मरीचिका सी छली गयी
आँधियों की धूल उड़कर,नैनों में कुछ चली गयी
धूप जीवन को जलाती ,कब मिला हमको सहारा ,
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

देख कर ऊँची दुकानें ,आस लगी पकवानों की।
पंडित क्षुधातुर लौटते,देख दशा यजमानों की।
वाणी रुदन कर मौन  है  साथ कब मिलता तुम्हारा ।
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

एक मुठ्ठी धूप होती ,चाँद खिड़की से झाँकता ।
जय पराजय से विमुख हो ,सुख अरगनी पर टाँगता।
समन्दर हाथ में भरकर ,टांकों आँचल में तारा  ।
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

©anita_sudhir

4 comments:

  1. बहुत,बहुत सुंदर 👌👌👌 सार्थक बिम्ब बिशेष आकर्षण सुसज्जित सृजन

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    1. आ0 आप की प्रतिक्रिया से लेखनी धन्य हुई

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