Sunday, November 7, 2021

दीप


 *दीप* 


दीप हो उर द्वार पर जब

जग प्रफुल्लित जगमगाए


झोपड़ी सहती व्यथा है

द्वार पर लक्ष्मी उदासी

उतरनों की जब दिवाली

फिर भरे कैसे उजासी

जो विवशता दूर भागे

फिर हँसी भी खिलखिलाए।।

दीप हो उर द्वार पर जब

जग प्रफुल्लित जगमगाए


जब अमीरों की तिजोरी

खोलती हो नित्य ताला

निर्धनों के गात भी जब 

ओढ़ते हों नव दुशाला

फिर कली महकी वहाँ पर

गीत भँवरा गुनगुनाए।।

दीप हो उर द्वार पर जब

जग प्रफुल्लित जगमगाए


तेल अंतस का जला कर

ज्योति की हो वर्तिका अब

यह अँधेरा दूर भागे

कर अहम को मृत्तिका अब 

कालिमा में लालिमा हो

भोर भी फिर गुदगुदाए।।

दीप हो उर द्वार पर जब

जग प्रफुल्लित जगमगाए


22 comments:

  1. आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 08 नवम्बर 2021 को साझा की गयी है....
    पाँच लिंकों का आनन्द पर
    आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. उत्तम संदेश। उत्तम भाव

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  3. अति सुंदर एवं जगमगाती रचना 🙏🏼💐💐

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  4. बहुत उम्दा🙏🙏👏👏

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  5. ऐसी असाधारण कविता किसी साधारण लेखनी से नहीं फूट सकती। कवयित्री की अद्भुत प्रतिभा को नमन।

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    1. आ0 आपके स्नेह के लिए हार्दिक आभार

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  6. जब अमीरों की तिजोरी

    खोलती हो नित्य ताला

    निर्धनों के गात भी जब

    ओढ़ते हों नव दुशाला

    फिर कली महकी वहाँ पर

    गीत भँवरा गुनगुनाए।।

    दीप हो उर द्वार पर जब

    जग प्रफुल्लित जगमगाए
    वाह!!!
    परोपकार एवं कल्याणकारी भावना के साथ लाजवाब
    नवगीत।

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  7. अप्रतिम भाव, अभिनव व्यंजनाएं , अभिराम सृजन।
    अद्भुत।🌷

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  8. बहुत सुंदर रचना

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  9. सुंदर उत्कृष्ट रचना ।

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