हठी
आज हठी ने ठान लिया है
अपने को ही नोच
नीति नियम क्यों
ताखे पर रख
अनुशासन का
कभी स्वाद चख
मनमानी जब
उड़े हवा में
घर में रहना सोच
किसकी पिच पर
कौन खेलता
असमंजस को
न्याय झेलता
कुटिल चाल अब
दौड़े भागे
लिए पैर में मोच
खिड़की से क्यों
कूदे सपने
मन की बातों
में हों अपने
चिथड़े-चिथड़े
सुख को पाते
नित ही हृदय खरोच
अनिता सुधीर आख्या
Wahh
ReplyDeleteमार्मिक
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