Friday, February 6, 2026

नवगीत

हठी

आज हठी ने ठान लिया है
अपने को ही नोच

नीति नियम क्यों
ताखे पर रख
अनुशासन का 
कभी स्वाद चख

मनमानी जब
उड़े हवा में 
घर में रहना सोच

किसकी पिच पर
कौन खेलता
असमंजस को
न्याय झेलता

कुटिल चाल अब
दौड़े भागे
लिए पैर में मोच

खिड़की से क्यों
कूदे सपने
मन की बातों 
में हों अपने

चिथड़े-चिथड़े
सुख को पाते
नित ही हृदय खरोच

अनिता सुधीर आख्या

Friday, January 9, 2026

माघ


माघ के दोहे

हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार।
दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।।

कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग।
इन जोड़ों के दर्द में,लगी हुई अब आग।।

सड़कें कांपे ठंड में,जलते नहीं अलाव।
लुका छिपी कर धूप भी,करे बुरा बर्ताव।

घर में ही नित स्नान से,आए नानी याद।
कल्प वास को माघ ने,सदा रखा आबाद।।

शंका का कुहरा घना,हुए लुप्त सब कथ्य।
सच की निकले धूप जब,तभी दिखेंगे तथ्य।।


अनिता सुधीर आख्या 

नवगीत

हठी आज हठी ने ठान लिया है अपने को ही नोच नीति नियम क्यों ताखे पर रख अनुशासन का  कभी स्वाद चख मनमानी जब उड़े हवा में  घर में रहना सोच किसकी प...