Thursday, April 9, 2026

गीतिका

आभासी जग का अपनापन।
हौले से छूता अंतर्मन।।

सुखद पलों को कैसे लिख दूँ 
जब मित्रों के होते दर्शन।।

बने लेखनी के संबल जो
शब्दों ने पाया उत्तम धन।।

नेह भरे नित  मार्ग दिखाए
धन्य हुआ तब काव्य सृजन।।

सरल सहज गुण गुरु से सीखा
अंतर्मन से उनका अभिनंदन।।

अनिता सुधीर आख्या 

2 comments:

  1. आज लंबे समय के उपरान्त आपकी इस नवीन कविता का आस्वादन करके मन हर्षित हो गया अनिता जी। बहुत ही सुंदर कविता है यह। प्रथम दो पंक्तियाँ ही बहुत कुछ कह देती हैं।

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  2. आ0 आपका सादर आभार
    इस माध्यम से आप सभी से मिलना सौभाग्य है

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