कुंडलिनी
शरीर के सात चक्र
कुंडलिनी के चक्र ने,करी समाहित शक्ति।
मुद्रा आसन जब करे,जाग्रत होता व्यक्ति।।
मूलाधार चक्र
चार पंखुड़ी का कमल,रंग चक्र का लाल।
साधे मूलाधार जो,ऊँचा होता भाल।।
स्वाधिष्ठान चक्र
श्रोणि क्षेत्र के चक्र को,कहते स्वाधिष्ठान।
रंग संतरी सूर्य का,करता ऊर्जावान।।
मणिपुर चक्र
नाभि क्षेत्र के चक्र में,पीत रंग उल्लास।
पाएँ मणिपुर ध्यान से,बुद्धि ज्ञान विश्वास।।
अनाहत चक्र
चक्र हृदय के मध्य में,हरित अनाहत ध्यान।
प्रेम भाव संचार से,हुआ सतो गुण गान।।
विशुद्धि चक्र
कंठ ग्रंथि के चक्र से,होती गरल विशुद्धि।
मनोभाव को शुद्ध कर,मिली संतुलित बुद्धि।।
आज्ञा चक्र
नयन तीसरा ज्ञान का,प्रभु का आज्ञा द्वार।
देखें अंतर्ज्योति से,अंतस का संसार।।
सहस्त्रार चक्र
गुरु का सहस्त्रार में,साधक करता ध्यान।
तन मन का एकीकरण,मिला मौन का ज्ञान।।
अनिता सुधीर आख्या
गागर में सागर समेट दिया है आपने। कुंडलिनी के चक्रों पर आपके इन दोहों की उपादेयता असीमित है।
ReplyDeleteसादर प्रणाम आ0
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteसादर प्रणाम
Deleteअति उत्तम संकलन मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार
ReplyDeleteवाह
ReplyDeleteसादर आभार
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद
Deleteवाह! एक साधक के लिए सुंदर दिशा प्रदान करती उपयोगी व सरस रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद अनिता जी
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