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माघ
माघ के दोहे हाड़ कॅंपाते माघ में,गृहणी है लाचार। दुबके लोग लिहाफ में,माँगे स्वाद अपार।। कांप कांप कर उंगलियां,बीनें बथुआ साग। इन जोड़ों के द...
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सहकर सबके पाप को,पृथ्वी आज उदास। देती वह चेतावनी,पारा चढ़े पचास।। अपने हित को साधते,वक्ष धरा का चीर। पले बढ़े जिस गोद में,उसको देते पीर।। दू...
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मुक्तक ग़मों को उठा कर चला कारवां है। बनी जिंदगी फिर धुआं ही धुआं है।। जहां में मुसाफ़िर रहे चार दिन के दिया क्यों बशर ने सदा इम्तिहां है।। अन...
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दिव्य युगेश* आल्हा छन्द आधारित मुक्तक युग निर्माता मोदी जी का,ओजपूर्ण व्यक्तित्व महान। पंक मध्य जो कमल खिला है,उसका अद्भुत है आख्यान।। दीप द...

शुभकामनाएं
ReplyDeleteहार्दिक आभार आ0
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