Friday, April 15, 2022

जीत के मंत्र

 

नवगीत


जीत के कुछ मंत्र बो दें 

अब लगी है धूप तपने


सौ परत में स्वप्न दुबका

सो रहा तकिया लगाकर

भोर सिरहाने खड़ी है

पैर को चादर उढ़ाकर

पथ विजय के नित पुकारें

धार हिय उत्साह अपने।।


कंठ सूखे होंठ पपड़े

ले नियति जब भागती है

पर्ण लेती सिसकियाँ जो

रात्रि भी फिर जागती है

अब पुरानी रीति बैठी

जीत के नव श्लोक जपने।।


रात ने माँगी मनौती

द्वार पर जो भोर उतरी

स्वेद श्रम से अब भिगोकर

कर्म की फिर बाँध सुतरी

रथ समय का चल पड़ेगा

ले कुँआरे साथ सपने।।


अनिता सुधीर






5 comments:

  1. भोर सिरहाने खड़ी है, पैर को चादर उढ़ाकर...अद्भुत🙏🙏

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(१६-०४ -२०२२ ) को
    'सागर के ज्वार में उठता है प्यार '(चर्चा अंक-४४०२)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  3. अत्यंत उत्कृष्ट एवं प्रेरणादायक सृजन 💐💐💐💐🙏🏼

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