Wednesday, July 30, 2025

मुक्तक

मुक्तक

ग़मों को उठा कर चला कारवां है।

बनी जिंदगी फिर धुआं ही धुआं है।।

जहां में मुसाफ़िर रहे चार दिन के

दिया क्यों बशर ने सदा इम्तिहां है।।


अनिता सुधीर आख्या 


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प्रियतम

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