मध्य अहम् की दीवारों से
कैसे पायें पार।
रखें ताक पर धीरज को
ढूँढ़ रहें क्यों सेज,
पहन प्रेम का आभूषण
पाती मन की भेज
बनता है राई का पर्वत
बात बात पर रार।।
मध्य अहम् की दीवारों से,कैसे पायें पार।।
किसकी रेखा बड़ी रहेगी
ह्रदय पटल पर द्वंद
कीट द्वेष का कुलबुल करता
बना गले का फंद
उम्मीदों की गठरी भारी
दूजे को दें भार।
मध्य अहम् की दीवारों से,कैसे पायें पार।।
प्रेम कूप अब बिना नीर के
सूख रहे हैं भाव
रहे क्रोध में तनी भृकुटियाँ
छिपा रहे हैं घाव
उच्च नासिका अब कब सोचे
नैना कर लें चार
मध्य अहम् की दीवारों से ,कैसे पायें पार।।
अनिता सुधीर