Tuesday, September 8, 2020

फिर पढ़ाई भी तरसती

नवगीत

*फिर पढ़ाई भी सिसकती*


पाठशाला मौन है अब

फिर पढ़ाई भी सिसकती


प्रार्थना के भाव चुप हैं

राष्ट्र जन गण गीत तरसे

पंजिका पर हाजिरी की

कब मधुर आवाज बरसे


श्यामपट खाली पड़े हैं

बात खड़ियों को खटकती।।



मुस्कराहट रूठती है

खेल सूने से खड़े हैं

वो जुगत जलपान वाली

आज औंधे मुख पड़े हैं

कुर्सियों पर  धूल जमती

प्रेत की छाया भटकती।।



भेलपूरी कौन लेता

खोमचे की है उदासी

 छूटते अब मित्र साथी

मस्तियाँ फिर लें उबासी


खूँटियों पर वस्त्र लटके

टीस सी अंतस कसकती।।




अनिता सुधीर आख्या

11 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-09-2020) को   "दास्तान ए लेखनी "    (चर्चा अंक-3819) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर सृजन सखी आज के माहौल पर सुंदर नवगीत।
    अप्रतिम।

    ReplyDelete
  3. बेहतरीन रचना सखी

    ReplyDelete
  4. आदरणीया अनिता सुधीर जी, नमस्ते! बहुत सुंदर नवगीत! उत्कृष्ट अभिव्यक्ति! साधुवाद!
    मैंने आपका ब्लॉग अपने रीडिंग लिस्ट में डाल दिया है। कृपया मेरे ब्लॉग "marmagyanet.blogspot.com" अवश्य विजिट करें और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराएं।
    आप अमेज़ॉन किंडल के इस लिंक पर जाकर मेरे कविता संग्रह "कौंध" को डाउनलोड कर पढ़ें।
    https://amzn.to/2KdRnSP
    आप मेरे यूट्यूब चैनल के इस लिंक पर मेरी कविता का पाठ मेरी आवाज में सुनें। मेरे चैनल को सब्सक्राइब करें, यह बिल्कुल फ्री है।
    https://youtu.be/Q2FH1E7SLYc
    इस लिंक पर कहानी "तुम्हारे झूठ से मुझे प्यार है" का पाठ सुनें: https://youtu.be/7J3d_lg8PME
    सादर!--ब्रजेन्द्रनाथ

    ReplyDelete
  5. खाली श्याम पट खड़िया को तरसते हैं ...
    बहुत कमाल का शब्द संयोजन ... नए शब्दों से रची सुन्दर गीत माला ...

    ReplyDelete

घर बनाते आजकल

घर बनाते आजकल खोखली सी नींव पर ही घर बनाते आजकल। मौन हों संवाद पूछें क्यों डराते आजकल।। जो हृदय की वेदना जग से छुपाने में लगे, वह स्वयं की म...