Thursday, October 31, 2019

लघुकथा 
रंगमंच
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सुनते सुनते थक गया हूं कि दुनिया रंगमंच है और तू किरदार!
 मैं ही हमेशा क्यों किरदार बनूं !
अब नहीं जीना मुझे ये जीवन.
मेरी डोर  सदैव किसी के हाथ में क्यों रहे ...
कहते हुए बड़ी तेज गुस्से में चिल्लाया था "तन "
जी हाँ मेरा अपना " तन "
आज  से मैं रंगमंच हूँ...
यदि मैं रंगमंच तो फिर किरदार कौन ?
अकुलाहट भरे मन  ने कोने से दबी आवाज लगाई, अब मैं किरदार हूँ,
तुम किरदार बन मनमानी करते रहे और पतन की ओर जा रहे हो !
मुझे तुम्हारे इस तन के रंगमंच पर  अपना किरदार  निभाना है और अभिनय को वास्तविक रूप देना है।
बाहर की आवाजें कैमरा  लाइट साउंड कट बहुत सुन चुके।
कुर्सियां खाली पड़ती जा रहीं हैं।
अब अन्तर्मन के लाइट और साउंड को सुन अभिनय करना है ।
नेपथ्य से नई आवाजें आने लगी हैं..

अनिता सुधीर

Friday, October 25, 2019


अकेला दीपक
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अकेले दीपक की टिमटिमाती लौ
देख अंधियारा मुस्करा ,ये कह उठा ,
सामर्थ्य कहाँ बची अब तुझमें
और मुझे मिटाने का ख्वाब सजा रहा।
रंग बिरंगी झालरों की रौनक में
तेरा वजूद गौण हो गया है ।
गढ़ता रहा जो कुम्हार ताउम्र तुम्हें
वो अब मौन हो गया है ।
दीपक भी हँस के बोला
मेरी सामर्थ्य का भान नहीं है तुम्हें,
मेरे वजूद की बात करते हो
तेरा वजूद मेरे ही तले है
मैं अकेला सामर्थ्य वान हूँ
तुम्हें कैद करने को ,
तमस मिटा करता हूँ उजास
अकेले दीप से दीप जलते रहेंगे
और तुम यूँ ही कैद में तड़पते रहोगे ।

अनिता सुधीर







Thursday, October 24, 2019


गीत 
आधार  हरिगीतिका छन्द 
विधान   28  मात्रा
 गागालगा गागालगा गागालगा गागालगा
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सद्भावना अरु प्रेम से निस दिन यहाँ त्यौहार हो।।
इक दूसरे की भावना का अब यहाँ  सत्कार हो।

अब भाव की अभिव्यक्ति का,ये सिलसिला है चल पड़ा,
रचते रहें ये गीत मधुरम छन्द से जो हो जड़ा ।
आशीष दो माँ शारदे बस भाव नित ओंकार हो ,
इक दूसरे की भावना का अब यहाँ  सत्कार हो।
सद्भावना...

खबरें परोसी जा रही, जो झूठ में लिपटी मिले,
इन्सान ऐसा कौन है इस घाव को जो अब सिले।
सच लिख सके जो अब सदा ऐसा नया अखबार हो।।
इक दूसरे की भावना का अब यहाँ  सत्कार हो।
सद्भावना...

बातें निरर्थक हो रहीं ,इसमें छिपा क्या राज है,
अपशब्द कहने का सभी को अब नया अंदाज है।
सम्मान करना युगपुरुष का अब सदा आचार हो ,
इक दूसरे की भावना का अब यहाँ  सत्कार हो।
सद्भावना...

मद के नशे में चूर जो,गाथा उन्हीं की क्यों कहे ,
वंदन चरण का क्यों करें अपमान हम क्यों कर सहें।
ये लेखनी सच लिख सके ,जलते वही अँगार हो ,
इक दूसरे की भावना का अब यहाँ  सत्कार हो।
सद्भावना...

स्वरचित
अनिता सुधीर 

Tuesday, October 22, 2019



दर्पण  को आईना दिखाने का प्रयास किया है

    दर्पण  #mirror
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दर्पण, तू लोगों को
आईना दिखाता है
बड़ा अभिमान है  तुम्हें
अपने  पर ,कि
तू  सच दिखाता है।
आज तुम्हे  दर्पण,
दर्पण दिखाते हैं!
क्या अस्तित्व तुम्हारा टूट
बिखर नहीं जाएगा
जब तू उजाले का संग
 नहीं पाएगा
माना तू माध्यम आत्मदर्शन का
पर आत्मबोध तू कैसे करा पाएगा
बिंब जो दिखाता है
वह आभासी और पीछे बनाता है
दायें  को बायें
करना तेरी फितरत है
और फिर तू इतराता  है
 कि तू सच बताता है ।
माना तुम हमारे बड़े काम के ,
समतल हो या वक्र लिए
पर प्रकाश पुंज के बिना
तेरा कोई अस्तित्व नहीं ।
दर्पण को दर्पण दिखलाना
मन्तव्य  नहीं,
लक्ष्य है
आत्मशक्ति के प्रकाशपुंज
से  गंतव्य तक जाना ।

अनिता सुधीर

Monday, October 21, 2019

औलाद 


समाज में व्यापत बुराईयों पर किसे दोष दूँ! जब अपनी ही औलाद  सही मार्ग का अनुसरण न करें और संस्कार हीन हो ...
ऐसे हर बिगड़े  बेटे और बेटियों की माँ  का आत्ममंथन…
****
बेटे तेरे कृत्यों पर  मैं  शर्मिन्दा हूँ
कोख शर्मसार हुई , क्यों जिन्दा हूँ ।

रब से की थी असंख्य दुआएं,
प्रभु से की मंगलकामनाएं ।
पग पग पर आँचल फैलाये
तुम पर कोई आंच न आये ।

लाड़ प्यार संग नैतिकता 
का तुमको पाठ पढ़ाया  था ।
कहाँ हो गयी चूक हमसे,जो
तुमने गलत कदम बढ़ाया था ।

लाड़ प्यार के अतिरेक में
तुम बिगड़ते  चले गए,या 
तुम्हारी गलतियों को हम
 नजरअंदाज करते गए ।

कहाँ तुम कमजोर पड़ गए!
क्यों तुम मजबूर हो गए 
एक नेक  भले  इंसान से  
तुम  कैसे हैवान बन गए ।

हैवानियत भी आज शरमा रही
तुम संग स्वयं से घृणा हो रही
मेरा दूध आज लजा रहा ,
दूसरे को क्या दोष दे ,जब
अपना ही सिक्का खोटा हो रहा ।

जब मासूमों से दरिन्दगी करते हो 
उनमें अपनी माँ बहने नहीं देख पाते हो।
गरीबों की चीखें सुन नहीं पाते 
बददुआयों से तिजोरियाँ भरते हो ।
और भी न जाने क्या क्या 
तुम अपराध किया करते हो ।

मेरे बच्चों
मत करो  शर्मिन्दा मुझे
अभी समय है चेत जाओ
अपराधों की सजा भुगत 
पश्चाताप कर सुधर जाओ।

नेक रास्ते पर कदम बढ़ा ,
दूध का कर्ज चुका जाओ ।
देश का भविष्य हो तुम 
समाज  में नई चेतना जगा जाओ ।

स्वरचित
अनिता सुधीर

Sunday, October 20, 2019


विदाई
***
सूने पार्क में
कोने के चबूतरे पर बैठी
यादों के बियाबान जंगल में
विचरण करती हुई..
तभी पीले पत्तों का शाख से विदा हो कर
स्पर्श कर जाना ,
निःशब्द, स्तब्ध कर गया मुझे ।
अंकुरण नई कोपलों का ,
हरीतिमा लिए पत्तियों में ऊर्जा का भंडार ,
जीवन भर का अथक प्रयास,
और अब  इनकी विदाई की बेला।
कितने ही दृश्य कौंध गये....
माँ की  नन्हीं गुड़िया की
घर से छात्रावास तक की विदाई
अपने जड़ों से दूर जाने की विदाई
एक आँगन से दूसरे आँगन में रोपने की विदाई
पत्नी ,बहू माँ रूप में जीवन का तप..
समय  के चक्र में वही क्रम ,वही विदाई
एक एक कर सब विदा लेते हुए....
वही नम आँखे ....
जीवन के  लंबे सफर में
उम्र के इस ढलान पर
काश मैं भी इन पत्तों सी विदाई ले लेती...
साँसों की डोर में..
निरर्थक  बंधी हुई ..
अंतिम विदाई ले पाती..
तभी एक मैले कुचैले कपडे में
एक अबोध बालिका का रुदन
विचलित कर गया ...
अभी रोकनी होगी अपनी अनंत 
यात्रा की कामना ..
और  सार्थक करनी होगी
अपनी अंतिम विदाई ...

Saturday, October 19, 2019

**बचपन**

दादी बाबा संग नहीं
भाई बहन का चलन नहीं
नाना नानी दूर हैं
और बच्चे...
एकाकी बचपन को मजबूर हैं ।
भौतिक सुविधाओं की होड़ लगी
आगे बढ़ने  की दौड़ है
अधिकार क्षेत्र बदल रहे
कोई  कम क्यों रहे
मम्मी पापा कमाते हैं
क्रेच छोड़ने जाते हैं
शाम को थक कर आते हैं
संग समस्या लाते हैं
बच्चों  खातिर समय नहीं
मोबाइल , गेम थमाते है
बच्चों के लिये कमाते हैं
और बच्चे ...
बचपन खोते जाते हैं ।
आबोहवा अब शुद्ध नहीं
सड़कों पर भीड़ बड़ी
मैदान  खेल के लुप्त हुए
बस्ते का बोझ बढ़ता गया
कैद हो गये चारदीवारी में
न दोस्तों का संग  मिला
बच्चों का ....
बचपन खोता जाता है
बच्चा समय से पहले  ही
बड़ा होता जाता है।
याद करें
अपने बचपन के दिन
दादी के  वो लाड़ के दिन
भाई बहनों संग मस्ती के दिन
दोस्तों संग वो खेल खिलौने के दिन
क्या ऐसा बचपन अब बच्चे पाते हैं
बच्चे ....
अपना बचपन खोते जाते हैं
आओ हम बच्चों का बचपन लौटाएं
स्वयं उनके संग बच्चे बन  जायें
वो बेफिक्री के दिन लौटा दें
बच्चों का बचपन लौटा दें।

अनिता सुधीर

आओ कान्हा मन हल्का कर लें

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं  आओ कान्हा ! मन हल्का कर लें रस्म निभाने आते उत्सव घर की चौखट सकुचाए  दुविधा लेकर खड़ा हुआ मन स्वागत कैसे क...