Wednesday, February 19, 2020

कल्पना



आस लिये मृग तृष्णा की,छूना चाहा नभ सारा,
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

नीर की जब प्यास लगती,मरीचिका सी छली गयी
आँधियों की धूल उड़कर,नैनों में कुछ चली गयी
धूप जीवन को जलाती ,कब मिला हमको सहारा ,
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

देख कर ऊँची दुकानें ,आस लगी पकवानों की।
पंडित क्षुधातुर लौटते,देख दशा यजमानों की।
वाणी रुदन कर मौन  है  साथ कब मिलता तुम्हारा ।
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

एक मुठ्ठी धूप होती ,चाँद खिड़की से झाँकता ।
जय पराजय से विमुख हो ,सुख अरगनी पर टाँगता।
समन्दर हाथ में भरकर ,टांकों आँचल में तारा  ।
कल्पना के गाँव में भी ,कब बसा है घर हमारा ।

©anita_sudhir

Tuesday, February 18, 2020

गीता

गीता
कुण्डलिनी
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1)
गीता का उपदेश ये, कर्म करो निष्काम।
लोभ मोह अरु क्रोध तज, जपो कृष्ण का नाम।
जपो कृष्ण का नाम ,भरे फिर पनघट रीता ।
रहो सदा समभाव , यही कहती है गीता ।
2)
गीता का हूँ श्लोक मैं,'वाणी'और कुरान ।
संग बाइबिल को लिये,है हिन्द संविधान ।
है हिन्द संविधान,घूँट क्यों विष का पीता ।
कसम दिलाना बाद ,समझ लो पहले गीता ।
3)
कल की चिंता छोड़िये,तन को नश्वर जान ।
अजर अमर आत्मा रहे ,ये गीता का ज्ञान ।
 ये गीता का ज्ञान,लोभ से गागर छलकी ।
छोड़ें माया मोह  ,करें क्यों चिंता कल की ।
4)
पावन गीता ग्रंथ का ,अंतिम क्षण में पाठ ।
करे मोक्ष की कामना,सजे चिता अब काठ ।
सजे चिता अब काठ,यहीं छूटा जग भावन ।
करिये सदा प्रयास ,रहे यह जीवन पावन  ।

Monday, February 17, 2020

मेहंदी

**
बड़ी जद्दोजहद हुआ करती थी
तब हिना का रंग चढ़ाने में,
हरी पत्तियों को बारीक पीसना
लसलसे लेप बना कर
सींक से आड़ी तिरछी रेखाओं को उकेरना ,
फूल,पत्ती ,चाँद सितारे ,बना उसमें अक्स ढूंढना
मेहंदी की भीनी खुश्बू से सराबोर हो जाना ।
सूखने और रचने के बीच के समय में
दादी का प्यार से खाना खिलाना ,
कपड़े में लगने पर माँ की डांट खाते जाना
सब साथ साथ चला करता था।
सहेलियों के चुहलबाजी का विषय
रची मेहंदी के रंग से पति का प्यार बताना।
भूला बिसरा  अब याद आता है ।
तीज त्यौहार की शान है मेहंदी
सौभाग्य का सूचक मेहंदी ,
स्वयं पिसती और कष्ट सह,
दूसरों की झोली खुशियों से भरती मेहंदी।
दुल्हन की डोली सजती,
पिया को लुभाती है मेहंदी
पुरातन काल से रचती आ रही मेहंदी
उल्लास से हाथों में सजती आ रही मेहंदी।
समय बदला ,हिना का रंग बदला!
अब मेहंदी गाढ़ी  ,गहरी रच जाती है
शायद प्राकृतिक रूप खो  चुकी है
इसीलिये दो दिन में बेरौनक हो जाती है।
अब पिसने के बाद रंग नहीं आता
तो प्यार का रंग नहीं बता पाती है ।
इस लगने और  रचने के बीच
कोई बहुत पास होता है
जो हाथ की लकीरों में रचा बसा होता है
और उससे ही होती है  हाथों में  मेहंदी ।

अनिता सुधीर

Sunday, February 16, 2020

रामायण


कुंडलिया
श्री रामायण ग्रंथ में ,अयन कथा प्रभु राम ।
दर्शन ,चिंतन राम का,'सप्त कांड' हरि नाम।
'सप्त कांड'हरि नाम,भक्ति से शीश झुकाया ।
चौबिस हजार श्लोक,गान कर मन हरषाया ।
आत्मसात कर पाठ ,भजे मन श्री नारायण ।
मिले मोक्ष का द्वार,पढ़े जब श्री रामायण ।
©anita_sudhir

विरह वेदना

***
बिंदी माथे पर सजा ,कर सोलह श्रृंगार ।
पिया तुम्हारी राह अब ,अखियां रही निहार ।।

बिस्तर पर की सिलवटें,बोलें पूरी बात ।
साजन हैं परदेश में ,मिला बड़ा आघात ।

पीड़ा मन की क्या कहूँ,रहते सदा उदास।
कैसे दिन अब काटते ,लिये मिलन की आस ।।

तुम बिन सूना जग लगे,भूल गये  दिन रात ।
खान पान की सुधि नहीं,सुख दुख की क्या बात।।

विरह अग्नि में जल रहे ,मिले तनिक ही चैन।
चंचल मन व्याकुल हृदय,हर पल है बैचैन ।।

विरह पीर में तन जले , कीजे कुछ उपचार ।
आओ प्रियतम पास में,तुम जीवन आधार।।

©anita_sudhir

Friday, February 14, 2020

श्रद्धांजलि


पुलवामा की दर्दनाक घटना के एक वर्ष बीतने पर शहीदों को शत शत नमन
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 घात लगाकर दे गए, आतंकी आघात।
एक वर्ष अब बीतता,ह्रदय व्यथित दिन रात।

वसन तिरंगा ओढ़ के , चले देश के लाल,
आँखे नम हैं देश की,व्यथित मातु अरु तात ।

आयी थी विपदा बड़ी,हमको कम मत आँक,
बदला रिपु से ले लिया,उसकी क्या औकात ।

व्यर्थ न होगा साथियों,ये अनमिट बलिदान,
वादा करते हम सदा  ,अरि को देंगे मात ।

कोटि कोटि उनको नमन ,जिनके तुम हो लाल ,
अर्पित श्रद्धा सुमन ये ,नहीं सहेंगें घात ।

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अनिता सुधीर
लखनऊ



प्रेम


मापनी- 2122 2122 212
पदांत- है समांत- आह
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प्रेम का छाया नया उत्साह है।
नित नये दिन से मना सप्ताह है।

बोल मुख से प्रेम के निकले नहीं
आपको मेरी कहाँ परवाह है।

वासना को प्यार कहते लोग अब,
प्रेम का होता कहाँ निर्वाह  है ।

प्रेम निश्चित दिन यहाँ मनने लगे,
प्रेमियों को मिल रही अब राह है ।

रंग की निखरी खुमारी देखिये ,
फाग का आया नया यह माह है।

याद पुलवामा रही दिल में अभी,
बीतते पल से निकलती आह है।

अनिता सुधीर

आयुर्वेद दिवस

शुभ दिन आयुर्वेद का,मना रहे सब लोग।  वैज्ञानिक आधार का,उत्तम है संयोग।। शरद विषुव के काल में,होते सम दिन-रात। हो जीवन में संतुलन,समझें सब यह...