Sunday, October 31, 2021

सरदार वल्लभ भाई पटेल



जब बँटा भारत था

त्रासदी आयी अति घोर।

लौह वल्लभ ने फिर 

एकता की बाँधी डोर।।

***

दूरदर्शिता सरिस शिवाजी, कूटनीति थी सम कौटिल्य। 

सजग सचेत सदा जीवन में ,नीति निपुणता थी प्राबल्य।।


बने बारडोली के नायक, महिलाएँ कहती सरदार। 

लौह पुरुष थे उच्च श्रृंग पर, लिए अखंडित देश प्रभार।। 


क्रांति करी थी रक्तहीन जो, लोकतंत्र का दे आधार। 

ऐसे नायक बिरले होते, जो जीवन को दें आकार।। 


मूर्ति खड़ी जो एका की है, हर उर में अब धड़कें आप।  

उन्हीं सिद्धांत पर आज चलें, कटे देश के सब संताप। 


नाप सकेगा कौन ऊँचाई,ऐसा बल्लभ भाई नाम। 

भारत रत्न महान रहा जो , नतमस्तक हो उन्हें प्रणाम।।


अनिता सुधीर आख्या

Saturday, October 30, 2021

काष्ठ


 

भाव उकेरे काष्ठ में, कलाकार का ज्ञान।
हस्तशिल्प की यह विधा,गाती संस्कृति गान।।

वृक्षों पर आरी चली,बढ़ा काष्ठ उपयोग।
कैसे शीतल छाँव हो, कैसे रहें निरोग।।

ठंडा चूल्हा देख के, आंते जातीं  सूख।
अग्नि काष्ठ की व्यग्र है,शांत करें कब भूख।।

छल कपटी व्यवहार से,क्यों रखते आधार।
नहीं काष्ठ की हाँडियाँ, चढ़तीं बारंबार।।

सजे चिता जब काष्ठ की, पावन हों सब कर्म।
गीता का उपदेश यह, समझें जीवन मर्म।।

Friday, October 29, 2021

दक्षिणा

दक्षिणा

***
'मॉम पंडित जी का पेमेंट कर दो '
सुन कर इस पीढ़ी के श्रीमुख से
संस्कृति कोने में खड़ी कसमसाई थी 
सभ्यता दम तोड़ती नजर आई थी ।

मैं घटना की मूक साक्षी बनी
पेमेंट और दक्षिणा में उलझी रही,
आते जाते गडमड करते विचारों को
आज के परिपेक्ष्य में सुलझाती रही।

दक्षिणा का सार्थक अर्थ बताने 
 उम्मीद लिए बेटे के पास आई
पूजन सम्पन्न कराने पर दी जाने 
वाली श्रद्धापूर्वक  राशि बताई 

एकलव्य और आरुणि की कथा सुना 
गुरू दक्षिणा का महत्व समझाई 
ब्राह्मण और गुरु चरणों में नमन कर 
उसे अपनी संस्कृति की दुहाई दे आईं

सुनते ही उसके चेहरे पर विद्रूप हँसी नजर आयी 
ऐसे गुरु अब कहाँ मिलते मेरी भोली भाली माई ,
अकाट्य तर्कों से वो अपने को सही कहता रहा
मैं स्तब्ध , उसे कर्तव्य निभाने को कहती आई ।

न ही वैसे गुरु रहे ,न ही वैसे शिष्य
दक्षिणा देने और लेने की सुपात्रता प्रश्नचिह्न बनी
विक्षिप्त सी मैं दो  कालखंड में भटकती रही,
दक्षिणा के सार्थक अर्थ को सिद्ध करती रही ।

प्रथम गुरू माँ  होने का मैं कर्तव्य  निभा न पाई
अपनी संस्कृति  संस्कार से अगली पीढ़ी को
परिचित करा न पाई
दोष मेरा भी था ,दोष उनका भी है 
बदलते जमाने के साथ सभी ने तीव्र रफ्तार पाई

असफल होने के बावजूद बेटे से अपनी दक्षिणा मांग आयी 
तुम्हारे धन दौलत सोने चांदी मकान से सरोकार नहीं मुझे 
बस तू नेक इंसान बन कर जी ले अपनी जिंदगी 
इंसानियत रग रग में हो,
उससे अपना पेमेंट माँग आयी।


अनिता सुधीर

Wednesday, October 27, 2021

नारी

बोले मन की शून्यता


बोले मन की शून्यता

क्यों डोले निर्वात


कठपुतली सी नाचती

थामे दूजा डोर 

सूत्रधार बदला किये 

पकड़ काठ की छोर

मर्यादा घूँघट लिए

सहे कुटिल आघात।।


चली ध्रुवों के मध्य ही 

भूली अपनी चाह 

पायल की थी बेड़ियां

चाही सीधी राह

ढूँढ़ रही अस्तित्व को 

बहता भाव प्रपात।।


अम्बर के आँचल तले

नहीं मिली है छाँव

कुचली दुबकी है खड़ी

नित्य माँगती ठाँव

आज थमा दो डोर को

पीत पड़े अब गात।।


अनिता सुधीर आख्या


Monday, October 25, 2021

ग़ज़ल



आपकी याद को जब ज़ुदा कर दिया।

रूह को जिस्म ने ज्यों फ़ना कर दिया।।


जिंदगी फिर अधूरी कहानी बनी

बेसबब ही दुखों को बड़ा कर दिया।।


तल्खियां जो पसरने लगी दरमियां

चाहतों ने वही फिर ख़ता कर दिया।।


खिड़कियां बंद रखने लगे अब सभी

फिर गमों ने यहाँ घोंसला कर दिया।।


आज़ भी धड़कनों को ख़बर ही नहीं

कब इन्हें ख्वाहिशों ने ख़फ़ा कर दिया।।


अनिता सुधीर आख्या

Sunday, October 24, 2021

करवा चौथ

*मेरे गगन तुम*

मैं धरा मेरे गगन तुम
अब क्षितिज हो उर निलय में

दृश्य आलिंगन मनोरम
लालिमा भी लाज करती
पूर्णता भी हो अधूरी
फिर मिलन आतुर सँवरती
प्रीत की रचती हथेली
गूँज शहनाई हृदय में।।

धार इठलाती चली जब
गागरें तुमने भरीं है
वेग नदिया का सँभाले
धीर सागर ने धरी है
नीर को संगम तरसता
प्यास रहती बूँद पय में।।

नभ धरा को नित मनाता
फिर क्षितिज की जीत होती
रंग भरती चाँदनी तब
बादलों से प्रीत होती
भास क्यों आभास का हो
काल मृदु हो पर्युदय में।।

अनिता सुधीर

Friday, October 22, 2021

मंथरा


 मंथरा घर-घर विराजी

झूठ थिर-थिर नच गया


वृक्ष की मजबूत टहनी

भाग्य पर इठला रही

नित कुटिलता जड़ हिलाती

वेदना है अनकही

पात फँसते चाल में जो

बंधनों का सच गया।।


कान कौवा ले उड़ा जो

दौड़ कर क्यों काग पकड़े

भरभरा विश्वास गिरता

प्रेम को जब लोभ जकड़े

सोच कुबड़ी जीतती जो

पल अकेला बच गया ।।


चाल चलकर काल निष्ठुर

ओढ़ चादर सो रहा

पीप की दुर्गंध सह कर

घाव रिसता रो रहा

मेहंदी भीगी पलक से

और अम्बर रच गया।।

आओ कान्हा मन हल्का कर लें

जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं  आओ कान्हा ! मन हल्का कर लें रस्म निभाने आते उत्सव घर की चौखट सकुचाए  दुविधा लेकर खड़ा हुआ मन स्वागत कैसे क...